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आलस का रोग

Motivational Story Aalasya ka Rog
Motivational Story | आलस का रोग

Motivational Story | आलस का रोग

भावपुर गांव में मोहन नाम एक बालक रहता था। मोहन के पिता जगदीश एक मेहनती किसान थे। जगदीश जितना मेहनती था उसका बेटा मोहन उतना ही आलसी और कामचोर था। न तो ढंग से पढ़ता-लिखता था और न ही घर या खेत के किसी काम में  हाथ बंटाता था।जब भी कुछ काम करने को कहा जाता तो तुरंत बहाना बना कर टाल देता। खाना, खेलना और सोना ही उसे आता था। मेहनत और समझदारी  से तो उसका दूर-दूर का भी नाता नहीं था। उसके इसी स्वभाव के कारण माता-पिता हमेशा चिंता करते रहते थे।

एक दिन पिता ने पुत्र को समझाया 

देखो मोहन बेटा, न तो तुम  पढ़ाई-लिखाई में ही मेहनत करते हो और न ही घर या खेत के ही किसी  काम में मेहनत करने की सोचते हो। तुम पूरी तरह से आलस के रोग से ग्रस्त हो गए हो। अगर ऐसा ही रहा तो तुम्हारा भविष्य खराब होगा। तुम न तो पढ़-लिखकर ही कुछ बन पाओगे और न ही खेतीबाड़ी करके ही गुजारा करने के लायक  रहोगे। इसलिए अभी भी समय है कि मेहनत का गुण सीख लो।

पिता ने जब भी मोहन को समझाने की कोशिश की  उसने उनकी हर बात को कानों पर से टाल दिया और  अपनी बुरी आदत को कभी भी सुधारने की कोशिश नहीं की। सही मानो तो आलस के रोग ने उसे निकम्मा बना दिया और घर वालों को उससे कोई उम्मीद नहीं रही।

चींटी और चिड़िया के बच्चों की बातें 

एक दिन मोहन और उसके पिता खेत पर गए। उस दिन गरमी बहुत थी इसीलिए मोहन जामुन के पेड़ घनी छाया में बैठकर खेलने लगा और उसके पिता खेत में उगाई मूंग से पकी-पकी सूखी फलियां इकट्ठी  करने में  लग गए। धूप और पसीना सहकर भी काम  में  लगे रहे। 

जामुन के पेड़ के नीचे खेलते-खेलते अचानक मोहन की नज़र चींटी और चिड़िया के बच्चों  पर पड़ीं। वे दोनों ऊंची आवाज़ में बातें करने में मग्न थे।

चींटी का बच्चा चिड़िया के बच्चे से

हम चींटियों के बच्चों को कोई मेहनत करना और अपने  माता-पिता के काम में उनकी मदद करना कोई  सिखाता नहीं है, बल्कि हम खुद सीख जाते हैं। अपने  माता-पिता को देख-देखकर खुद ही मेहनत करने लग जाते हैं। आलस और सुस्ती तो हमें पता भी नहीं कैसी होती है! सारा दिन हंस-हंसकर काम करते हैं और  इसी कारण हमारे माता-पिता को हम पर गर्व है और  वे हमसे बहुत खुश रहते हैं।

चिड़िया का बच्चा चींटी के बच्चे से

तुम बिलकुल ठीक कहते हो।हम चिड़िया के बच्चे भी बहुत  मेहनती होते हैं और  हमारे माता-पिता भी हमसे बहुत खुश रहते हैं। वे तो हमें बस उड़ना भर सिखाते हैं फिर उसके बाद तो हम अपनी मेहनत से जीना सीख जाते हैं। आलस और सुस्ती कैसे होते हैं हमें इसका अनुभव जीवन में कभी हो ही नहीं पाता।

चिड़िया का बच्चा थोड़ा मुंह बनाकर

उधर इंसान के बच्चे उस मोहन को तो देखो कितना  आलसी और कठोर बालक है! पिता तो धूप में  मेहनत कर रहे हैं और यह पेड़ की छाया में आराम कर रहा है। ऐसे इंसानों के बच्चों से तो हम जानवरों के बच्चे अच्छे हैं! 

मोहन उन दोनों की बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उसी समय अपने आलस के रोग छुटकारा पाने के लिए बेचैन हो उठा। उसने चींटी और चिड़िया के बच्चों से कहा।

मोहन चींटी और चिड़िया के बच्चों से 

दोस्तो, तुम दोनों ने मुझे जो सबक सिखाया है मैं उसके लिए तुम्हारा जीवन भर आभारी  रहूंगा और भविष्य में  सदा तुम्हारे जैसा बने रहने की कोशिश करूंगा। आज से मैं भी  मेहनत करूंगा और अपने माता-पिता के  काम में हाथ बंटाऊंगा। खूब पढ़-लिखकर उनका ना ऊंचा करूंगा।

यह कहकर मोहन तुरंत उठकर मूंग के खेत में जाकर  अपने पिता के साथ मिलकर मूंग की फलियां इकट्ठी करने के काम  में लग गया। उस दिन के बाद से उसने आलस का रोग सदा के लिए त्याग दिया और उसके माता-पिता उससे बहुत खुश रहने लगे।

सीख: आलस का त्याग किए बिना जीवन में कोई सुख प्राप्त नहीं होता है।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

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