Help Hindi Me

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की जीवनी

https://helphindime.in/who-is-florence-nightingale-biography-jivani-jivan-parichay-information-life-history-essay-story-hindi/
Who is Florence Nightingale | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Information | Life History | Essay | Story in Hindi

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की जीवनी | Florence Nightingale Biography in Hindi

फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग का जन्मदाता कहा जाता है। उन्होंने अपनी सेवा भावना के चलते कई हजार लोगों की मदद की। यही वजह थी कि उन्हें लेडी विद द लैंप के उपनाम से पुकारा जाता है। उन्होंने नर्सिंग के क्षेत्र में आने के लिए अपने परिवार के विरोध का सामना किया। लेकिन आखिरकार वह रोगियों की सेवा में जुटीं। यदि फ्लोरेंस नाइटिंगेल न होती तो आज नर्सिंग एक सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता। आइए जानते हैं उनके जीवन के बारे में-

नामफ्लोरेंस नाइटिंगेल
जन्मतिथि12 मई 1820
जन्म स्थानफ्लोरेंस, इटली
माता का नामफ्रांसिस नाइटिंगेल
पिता का नामविलियम एडवर्ड नाइटिंगेल
पेशानर्स
मृत्यु तिथि13 अगस्त 1910
मृत्यु के समय आयु90 वर्ष
Who is Florence Nightingale | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Information | Life History | Essay | Story in Hindi

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का प्रारंभिक जीवन (Early life of Florence Nightingale)

12 मई 1820 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म हुआ। वे इटली के फ्लोरेंस में पैदा हुई हालांकि उन्होंने अपनी बाकी जिंदगी इंग्लैंड में गुजारी। बता दें, उनके जन्मदिन पर हर साल 12 मई को वर्ल्ड नर्सिंग डे मनाया जाता है। उनका जन्म एक अमीर और संपन्न परिवार में हुआ। उनकी माता का नाम फ्रांसिस नाइटिंगेल तथा पिता का नाम विलियम एडवर्ड नाइटिंगेल था। जैसा कि आप जानते हैं फ्लोरेंस ने अपना पूरा जीवन रोगियों की सेवा में बिताया लेकिन स्वयं फ्लोरेंस शारीरिक कमजोरी से घिरी हुई थी। बचपन में उनके हाथ इतने कमजोर थे कि वे 11 वर्ष की आयु तक लिखना ही नहीं सीख पाई थीं।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की शिक्षा (Education of Florence Nightingale)

11 साल की उम्र में लिखना सीखने के बाद ही फ्लोरेंस में अपनी औपचारिक शिक्षा ली। उन्होंने गणित, लैटिन तथा ग्रीक भाषा में शिक्षा हासिल की। दरअसल, उनकी शिक्षा उन्हें उनके पिता ने दी। गणित उन्हें सबसे अच्छा विषय लगता था। जब फ्लोरेंस 17 साल की हुईं तो उन्होंने अपनी मां से अनुरोध किया कि उन्हें गणित पढ़ने दिया जाए। लेकिन उनकी मां ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि गणित औरतो के पढ़ने का विषय नहीं है। एक लंबे समय तक फ्लोरेंस अपने परिजनों को गणित पढ़ने के लिए मनाती रही और आखिरकार उनके परिजनों ने उनकी बात मान ली और उन्हें गणित पढ़ने की अनुमति दे दी गई। लेकिन समय बीतने के साथ उन्होंने अपना करियर नर्सिंग के क्षेत्र में बनाने की ठान ली क्योंकि वह एक अमीर परिवार से थी इसीलिए उनके माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं थे। उस दौर में लड़कियां नर्सिंग करने का सोचती तक नहीं थी।

फ्लोरेंस ने अपने परिजनों के विरोध के बाद भी रोम जाकर नर्सिंग का प्रशिक्षण हासिल किया। इसके बाद से ही वे लगातार रोम और पेरिस के अस्पतालों के दौरे करने लगी। वर्ष 1853 में लंदन जाकर उन्होंने महिलाओं का एक अस्पताल भी खोला। जहां उन्होंने कई मरीजों की देखभाल की। उन्होंने अपने कठिन प्रयासों से इसे विकसित किया जिससे उन्हें लोग पहचानने लगे।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का नर्सिंग में करियर (Florence Nightingale’s career in Nursing)

उनके करियर की शुरुआत सही मायने में 1854 में हुई। इस दौरान ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की, रूस के खिलाफ युद्ध कर रहे थे जिसे क्रीमिया का युद्ध कहा जाता है। युद्ध की वजह से बड़ी मात्रा में सैनिक घायल हुए व अस्पताल गंदगी तथा मरीजों से लबालब भर गए। लेकिन फिर भी वहां की सेना ने महिला नर्सों को नियुक्त करना गवारा नहीं समझा। अस्पतालों में रोगियों की दयनीय स्थिति फ्लोरेंस नाइटिंगेल से देखी नहीं गई उन्होंने महिलाओं की अपनी टुकड़ी बनाई तथा युद्धस्थल में प्रवेश किया लेकिन उन्हें वहां भी उपेक्षा का सामना करना पड़ा।

इसी दौरान रूस के 50,000 सैनिकों ने जवाबी हमला कर दिया और उस समय ब्रिटिश सैनिकों की संख्या सिर्फ 8000 थी सिर्फ 6 घंटों के अंदर ही 2500 ब्रिटिश सैनिक हमले से घायल हुए और अस्पताल की स्थिति और खराब हो गयी। लेकिन फ्लोरेंस ने हार न मानते हुए नर्सों की टुकड़ी के साथ सैनिकों का उपचार करना शुरू कर दिया। वे लोग रोगियों का इलाज तो कर ही रहे थे इसके साथ ही अस्पताल की साफ-सफाई का भी ध्यान रख रहे थे। वे प्रतिदिन 20 घंटे काम करतीं थी। फ्लोरेंस गणित में माहिर थी और उन्होंने इसी का प्रयोग करते हुए कुछ आंकड़े निकाले जिसमें उनको पता चला कि अस्पताल की साफ-सफाई की वजह से ही मृत्यु दर में 60 फ़ीसदी की कमी आ गई।

धीरे-धीरे अधिकारियों के रवैए में परिवर्तन आया और जनता ने आर्थिक रूप से धन एकत्र कर फ्लोरेंस को दिया जिससे वे अपने काम को निरंतर कर सकें। युद्ध खत्म हुआ लेकिन फिर भी फ्लोरेंस अपने काम में जुटी रहीं। उनके प्रयासों के परिणामस्वरुप ही 1859 में आर्मी मेडिकल स्कूल की स्थापना हुई और इसी साल सेंट थॉमस अस्पताल में एक नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल भी स्थापित किया गया। सेंट थॉमस अस्पताल में नर्सों को प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्होंने अस्पताल के रखरखाव का ध्यान रखा और उन्हें उनके कामों के लिए रानीविक्टोरिया और प्रिंस अल्बर्ट ने उनकी सराहना की।

यह वर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसी साल उनके द्वारा नोट्स ऑन नर्सिंग नामक पुस्तक का प्रकाशन किया गया। जोकि नर्सिंग पाठ्यक्रम के लिए दुनिया की पहली पुस्तक बनी।

इतने रोगियों के लिए काम करने वाली फ्लोरेंस के साथ खुद एक दुखद घटना घटी और 1861 में वह एक रोग की शिकार हो गयीं जिस वजह से 6 सालों तक चलने में असक्षम हो जाती है लेकिन फिर भी वह लोगों के इलाज और चिकित्सा उपकरणों के विकास में काम करना शुरू करतीं है और अपना लेखन कार्य भी जारी रखती हैं।

फ्लोरेंस ने उस समय नर्सिंग के क्षेत्र में अपना करियर बनाया जिस समय इस काम को हिकारत की नजरों से देखा जाता था । वह रोगियों की मदद करने के साथ ही उनका ध्यान भी रखती थीं।

फ्लोरेंस को मिला लेडी विद द लैंप का उपनाम (Florence Nightingale: Lady with the Lamp)

फ्लोरेंस नाइटिंगेल को लेडी विद द लैंप का उपनाम मिला। दरअसल, वह रात के समय लालटेन लेकर पूरे अस्पताल में घूमती थीं जिससे यदि किसी मरीज को कोई दिक्कत हो तो वह उसकी मदद कर सके। जो मरीज किसी तकलीफ की वजह से सो नहीं पाते थे वह उनकी तकलीफों को दूर करती थीं तथा जो लिख नहीं पाते थे वे उनके लिए उनके परिजनों को पत्र लिखकर भेजती थीं। उन्होंने मरीजों के लिए काम करते हुए दिन-रात एक कर दिया। यही वजह थी कि लोग उन्हें लेडी विद लैंप के नाम से पुकारने लगे।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की मृत्यु (Florence Nightingale’s Death)

फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जुड़ाव भारत से भी था क्योंकि वह भारत में ब्रिटिश सैनिकों के स्वास्थ्य को बेहतर करने से संबंधित मिशन से जुड़ी हुई थी। वहीं दूसरी ओर फ्लोरेंस ने भारत में साफ पानी की सप्लाई पर जोर दिया। उन्होंने भारत में अकाल पीड़ितों की मदद के लिए भी मुहिम चलाई। उनका मानना था कि भारत में अकाल के हालात तुर्की के स्कुतारी के समान थे। साल 1906 तक फ्लोरेंस को भारत की स्थिति के बारे में रिपोर्ट भेजी जाती रही। लेकिन इसके कुछ वर्षों बाद, साल 1910 में फ्लोरेंस का निधन हो गया। उस समय वह 90 वर्ष की थी।

फ्लोरेंस का देहांत उस समय हुआ जब वह लंदन के अपने घर में सो रही थी। पहले उन्हें वेस्टमिन्स्टर ऐबी में दफनाने का प्रस्ताव रखा गया था जिसे उनके रिश्तेदारों ने अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्हें हैम्पशायर के सेंट मार्गरेट चर्च के प्रांगण में दफ़नाया गया।

फ्लोरेंस ने अपनी मृत्यु से पहले 100 से ज्यादा पुस्तकें लिखी थी जिन्हें कभी भी प्रकाशित नहीं किया गया।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन को नर्स दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन जिन नर्सों ने नर्सिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया होता है उन्हें फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल के अवार्ड्स और उपलब्धियां (Awards & Achievements)



लिओ टॉलस्टॉय की जीवनी

नेपोलियन बोनापार्ट की जीवनी

तो ऊपर दिए गए लेख में आपने पढ़ा Who is Florence Nightingale | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Information | Life History | Essay | Story in Hindi, उम्मीद है आपको हमारा लेख पसंद आया होगा।

आपको हमारा लेख कैसा लगा हमें कमेंट करके जरूर बताएं, अपने सुझाव या प्रश्न भी कमेंट सेक्शन में जा कर पूछ सकते हैं। ऐसे ही लेख पढ़ने के लिए HelpHindiMe को Subscribe करना न भूले।

Author:

भारती, मैं पत्रकारिता की छात्रा हूँ, मुझे लिखना पसंद है क्योंकि शब्दों के ज़रिए मैं खुदको बयां कर सकती हूं।

Exit mobile version