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महर्षि वाल्मीकि की जीवनी

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महर्षि वाल्मीकि की जीवनी | Who is Valmiki | Real Original Name | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Story | Life History | Essay | Information in Hindi

महर्षि वाल्मीकि की जीवनी | Valmiki Biography in Hindi

आप सभी इस बात से वाकिफ होंगे कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि महर्षि वाल्मीकि जो इतने बड़े महाकवि कहलाए वे पहले एक डाकू हुआ करते थे। आइए जानते हैं उनके डाकू से रामायण के रचयिता बनने के जीवन के बारे में-

नाममहर्षि वाल्मीकि
अन्य नामरत्नाकर
जन्मत्रेता युग
पेशामहाकवि, डाकू
पिता का नामप्रचेता
माता का नामचर्षणी
रचनारामायण
महर्षि वाल्मीकि की जीवनी | Who is Valmiki | Real Original Name | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Story | Life History | Essay | Information in Hindi

महर्षि वाल्मीकि का प्रारंभिक जीवन

महर्षि वाल्मीकि का जन्म त्रेता युग में हुआ। हिंदू पंचांग के मुताबिक वह अश्विनी महीने की पूर्णिमा के दिन पैदा हुए। मान्यता के अनुसार महर्षि वाल्मीकि महर्षि कश्यप और अदिति के नवे पुत्र प्रचेता के बेटे थे। वही उनकी माता चर्षणी थी। जानकारी के अनुसार वाल्मीकि जी के एक भाई भी थे जिनका नाम भृगु था। कहा जाता है कि बचपन में उन्हें एक भील ने चुरा लिया था। आपको बता दें, भील गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र तथा राजस्थान में एक अनुसूचित जनजाति है।

इस जनजाति के द्वारा उन्हें चुराने के बाद उनका लालन-पालन इसी प्रजाति में हुआ। भील प्रजाति जंगलों में ही निवास करती थी और इसी तरह से वाल्मीकि भी जंगलों में ही रहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने वहीं का रहन-सहन तथा पेशा चुना और वे आगे जाकर एक बहुत बड़े डाकू बने।

उनका नाम पहले रत्नाकर था जो कि रामायण की रचना के बाद बदलकर महर्षि वाल्मीकि हो गया। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी जिससे आदिकाव्य के नाम से जाना जाता है। वहीं वाल्मीकि के लिए आदिकवि का प्रयोग किया जाता है जिसका मतलब होता है सबसे पहला कवि।

रत्नाकार से महर्षि वाल्मीकि बनने की यात्रा

भील प्रजाति जंगलों में निवास करती थी तथा वह लोगों को लूटकर ही अपना पेट पालते थे। यही वजह थी कि महर्षि वाल्मीकि जो कि डाकू रत्नाकार के नाम से उस समय प्रसिद्ध थे वे भी डकैती किया करते थे और जरूरत पड़ने पर उनकी हत्या भी कर देते थे, ऐसे ही एक दिन नारद मुनि जंगल में से निकल रहे थे और उसी दौरान डाकू रत्नाकर भी अपने शिकार की खोज कर रहे थे, उन्होंने जैसे ही नारद मुनि को देखा वैसे ही बंदी बना लिया। पकड़े जाने पर नारद मुनि ने उनसे पूछा कि वह आखिर यह पाप क्यों कर रहे हैं? इसके जवाब में वे कहते हैं कि वह अपने परिजनों के लिए यह सब कर रहे हैं। इस सवाल पर ही नारद मुनि अगला सवाल उनसे पूछते हैं और कहते हैं कि अपने परिजनों से यह पूछकर बताओ कि क्या वे इस पाप के फल के हिस्सेदार बनेंगे या नहीं। इसके जवाब में बिना सोचे समझे ही रत्नाकार हामी भर देते हैं।

इसके बाद नारद मुनि उनसे कहते हैं कि एक बार यही सवाल अपने परिजनों से पूछो और यदि वे हां कहते हैं तो मैं अपना सारा धन और आभूषण खुद ही तुम्हें दे दूंगा। जब महर्षि वाल्मीकि यही प्रश्न लेकर अपने परिजनों और मित्रों के पास जाते हैं तो उनका कोई भी मित्र या परिवार का सदस्य इसमें हामी नहीं भरता, जिसके बाद वाल्मीकि को काफी आघात पहुंचता है और वह नारद जी के पास जाते हैं तथा उन्हें बताते हैं कि वे उन्हें सही राह दिखाएं जिस पर नारद मुनि उनसे कहते हैं कि वह राम का जाप लगातार करें।

रत्नाकार उनकी बात मान लेते हैं और वन में चले जाते हैं। वह राम नाम का जाप करने लगते हैं लेकिन उनके मुंह से गलती से मरा मरा निकल जाता है जिस वजह से वे कमजोर हो जाते है तथा उन पर चीटियां लग जाती है। लेकिन फिर भी वे अपनी कड़ी तपस्या से प्रभु को प्रसन्न कर देते हैं। कहा जाता है कि जब महर्षि वाल्मीकि तप कर रहे थे तब उनके शरीर के ऊपर बांबी यानी कि दीमक घर बना लेते हैं। इन बांबी को वाल्मीकि भी कहा जाता है।

जब महर्षि वाल्मीकि दीमक के घर को तोड़कर बाहर निकलते हैं तब लोगों द्वारा उन्हें वाल्मीकि कहा जाने लगता है। वाल्मीकि की कठोर तपस्या से ब्रह्मा प्रसन्न हो जाते हैं जिसके बाद ब्रह्मा जी से महर्षि वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

रामायण के प्रथम श्लोक की रचना

एक दिन नदी किनारे वाल्मीकि तपस्या करने जा रहे थे उसी वक्त उन्होंने सारस पक्षी के जोड़े को देखा। वे दोनों पक्षी आपस में प्रेम कर रहे थे तभी अचानक एक शिकारी ने नर पक्षी पर बाण चला दिया और उसकी मृत्यु हो जाती है। इस कृत्य को देखकर वाल्मीकि जी के मुख से एक श्लोक अपने आप निकल पड़ता है।

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमःशाश्वती: समा:।
यतकरौंचमिथुनादेकम अवधी: काममोहितम।।

अर्थ:- अरे बहेलिए, तूने काम मोहित मैथुनरत सारस पक्षी की हत्या की है। जा तुझे कभी प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी।

महर्षि वाल्मीकि का रामायण की रचना करना

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना संस्कृत भाषा में की। उन्होंने जिस रामायण की रचना की उसका नाम वाल्मीकि रामायण पड़ा। बता दे रामायण एक महाकाव्य है जिसमें राम के जीवन के बारे में सारी जानकारियां दी गई हैं। हालांकि महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखे गए रामायण में राम चंद्र जी को एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रदर्शित किया गया है जिसमें यह बताया गया है कि राम संपूर्ण मानव जाति के लिए कैसे आदर्श बने। रामायण प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है।

इसके अलावा रामायण में वाल्मीकि जी ने अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है उन्होंने समय, सूर्य, चंद्र तथा नक्षत्रों का वर्णन भी रामायण में किया है। इसके अलावा उन्होंने रावण की मौत से पहले राक्षसी त्रिजटा के स्वप्न, विभीषण का लंका के अपशगुन आदि के बारे में भी बताया है। इसी से यह तय किया जाता है कि उन्हें ज्योतिष विद्या तथा खगोल विद्या का ज्ञान था।

वाल्मीकि का तीन कालों में उल्लेख

वाल्मीकि जी का उल्लेख सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में मिलता है। भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान वाल्मीकि जी के आश्रम का दौरा किया। वहां राम ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया। स्वंय राम ने उनसे कहा कि, ‘आप त्रिकालदर्शी मुनि हो, आपके हाथ में संसार एक बेर के समान प्रतीत होता है।’

महर्षि वाल्मीकि का ज़िक्र महाभारत काल में भी है जब कौरवों- पांडव का युद्ध होता है तथा उसमें पांडव विजयी होते हैं तब द्रोपति द्वारा ही यज्ञ रखा जाता है। यज्ञ को शुरू करने के लिए शंख बजाना अनिवार्य होता है लेकिन कृष्ण सहित सभी लोग इसमें असफल हो जाते हैं। तब कृष्ण के कहने पर सब वाल्मीकि से प्रार्थना करते हैं और वाल्मीकि वहां प्रकट होते हैं तो खुद ब खुद शंख बजने लगता है। जिससे द्रोपति का यज्ञ संपन्न हो जाता है। इस घटना के बारे में कबीर ने भी लिखा है कि, “सुपच रूप धार सतगुरु आए। पांडव के यज्ञ में शंख बजाए।”

वाल्मीकि जयंती कार्यक्रम

महर्षि वाल्मीकि के जन्मदिन पर उनकी याद में वाल्मीकि जयंती मनायी जाती है। यह हिंदू पंचांग के मुताबिक अश्वनी महीने की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस दिन शोभायात्रा निकाली जाती है तथा वाल्मीकि के प्रतिमा स्थल पर मिठाई, खाना, फल और भंडारे का आयोजन किया जाता है। जैसा महर्षि वाल्मीकि ने अपने जीवन में बुरे कर्म को त्याग कर अच्छे कर्म का रास्ता चुना। यही प्रेरणा इन लोगों के बीच प्रसारित की जाती है। उत्तर भारत में वाल्मीकि जयंती को प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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Author:

भारती, मैं पत्रकारिता की छात्रा हूँ, मुझे लिखना पसंद है क्योंकि शब्दों के ज़रिए मैं खुदको बयां कर सकती हूं।

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