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Hindi Kavita Yeh Hai Zindagi

Hindi Kavita Yeh Hai Zindagi
Hindi Poetry | Hindi Kavita | Hindi Kavita Yeh Hai Zindagi

मोटी छोटी प्यारी

वो मोटी मगर छोटी है
जरा सी बात पर
नाक भौं सिकोड़ने में पारंगत ही नहीं
पूरी तरह डाक्टर मास्टर है।

मजाल है कि हार मान ले
जिद्दी इतना कि खुद को
सबसे ऊपर समझती है।
घर में इस हिटलर से
मम्मी पापा तक डरते हैं,

तब हमारी औकात ही क्या है?
गुस्से में जब वो दिखती
दूर से ही थर थर काँपता हूँ।

क्या मजाल है मुंँह से
आवाज भी निकल सके
हिटलर के आगे हिम्मत किसकी
जो उसके गुस्से पर लगाम लगा सके?

मगर वह बहुत भावुक भी है
किसी को तकलीफ में नहीं देख सकती
दिन रात उसकी चिंता करती
उसके पास से हटना तक नहीं चाहती।

नींद ,भूख से जैसे बैर हो जाता है
जब तक वो पूरी तरह
ठीक नहीं हो जाता।
बस यही तो उसकी आदत
हम सबको बहुत प्यारी लगती है।

हिटलर हम सबके दिल में राज करती है
मोटी, छोटी हमारी खुशियों का संसार है।

बेवकूफ हैं हम

अगर आप ऐसा सोचते हैं
कि बेवकूफ हैं हम
तो बड़ा उत्तम है,
क्योंकि मुझे लगता है
आप मेरे सबसे बड़े शुभचिंतक हैं।

अपने आप मुझसे दूर रहेंगे
साथ ही मेरे सूकून को
संपूर्ण समर्थन देंगे।

यही नहीं आप उनसे तो बड़े अच्छे हैं
जो स्वार्थवश मुझे होशियार समझते हैं
हर समय मेरी महानता, बड़प्पन
और जो गुण मुझमें जन्म से ही नहीं है
उसका भी मक्खन के साथ
दिन रात गुणगान करते हैं।

इतना तक ही रहे तो फर्क नहीं है,
वो तो तारीफों की आड़ में
पीठ में छुरा घोंपने की तलाश में रहते हैं।

हम भी कुछ कम थोड़ी हैं
जितना वे खुद को
होशियार, समझदार मानते हैं
हम उनसे दो क्या चार कदम
आगे ही रहते हैं।

उनसे ज्यादा समझदार हैं हम
क्योंकि उनकी होशियारी, समझदारी पर
मायूसी की घास डालते चलते हैं हम,
वे हमें जितना बेवकूफ समझते हैं
उतना ही बेवकूफ उन्हें
रोज रोज बनाते रहते हैं हम।

इंसान हैं तो

इंसान हैं हम आप तो
इंसानियत भी दिखना चाहिए,
गिरगिट की रंग बदलने से
हम सबको बचना चाहिए।

भेड़िए का खाल ओढ़कर
बेशर्म बनने से क्या मिलेगा?
अंदर से कुछ हैं,
भीतर से कुछ और से
कुछ हाथ नहीं आने वाला,
सिर्फ हाथ मलने के सिवा
कुछ हासिल भी नहीं होगा।

आपका लगता है कि आप
बुद्धिमान बहुत हैं,
पर सच तो यह है कि
आप से बड़ा बेवकूफ
दूजा नहीं मिलने वाला।
इंसान हो तो इंसानियत को
शर्मसार न कीजिए,

स्वार्थ की खातिर खुद को
बदनाम न कीजिए।
चाल चरित्र चेहरे में एकरूपता रखिये
इंसान हैं तो इंसान ही बने रहिए
इंसानियत को चौराहे पर न नंगा करिए,

इतनी भी समझ नहीं तो
खुद को इंसान मत कहिए
शर्मोहया है अगर जरा सा भी है
तो जाइये किसी खाई में कूद जाइए,
इंसान को शर्मिंदगी से बचाइये।

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Author:

Sudhir Shrivastava

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.

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