Best Hindi Poetry

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Best Hindi Poetry | एक साया आया

मन में बेचैनी संग
अनचाहा डर समाया था,
उलझनों का फैसला मकड़जाल
जाने क्यों समझ से बाहर था।

नींद आँखों से कोसों दूर थी,
जैसे नींद और आँखो की
न कोई प्रीति थी।

कैसे भी चैन नहीं मिल रहा था
बेचैनी से बचने के चक्कर में
मैं बार बार बाहर भीतर आ जा रहा था,
पर सूकून का ओर छोर लापता था।

सच कहूं तो खुद के साथ साथ
ईश्वर पर गुस्सा भी आ रहा था,
मेरे गुस्से का असर शायद
उस तक पहुंच गया था।

फिर तो कमाल हो गया
शायद ईश्वर भी परेशान हो गया
ऐसा लगा कि ईश्वर मुझसे कुछ कह रहा है
पर क्या ये समझ में नहीं आ रहा था।

फिर ऐसा लगा एक साया आया
मेरी बांह पकड़ बिस्तर पर लाया
मुझे जबरन लिटाया
मेरे सिर पर हाथ फेरा और लुप्त हो गया
पर मेरी हर उलझन जैसे हर ले गया
क्योंकि मैं चैन की नींद सो जो गया
अपनी उपस्थिति का वो अहसास छोड़ गया।

कौन था वो ये तो मुझे पता नहीं
पर मुझे सूकून भरी छांव जरुर दे गया,
जैसे अपना कोई क़र्ज़ उतार गया
फिर मिलने का आश्वासन भी दे गया
पर कब, कहाँ और कैसे
ये तो बताया ही नहीं पर
चुपचाप मेरे मन में अपनी छवि छोड़ गया।

जी कैसे रहा है

आपने तो पढ़ा नहीं
पढ़ा तो शायद पल्ले नहीं पड़ा,
वरना यूं मुस्कुरा नहीं पाते,

आँख से झलक जो आते आँसू
आप उसे रोक भी नहीं पाते।
वो शब्द नहीं शूल से हैं
कलेजे को चीर रहे हैं
नश्तर के बाद भी
रुधिर तो नहीं बहता,

पर उस दर्द को सहना
इतना आसान भी नहीं होता।
जाइए जरा पूछिए उससे
जिसने उस शब्द को सिर्फ गढ़ा नहीं
एक एक शब्द पलों में जिया भी है,

जिया भी तो ऐसा की पत्थर बन गया
पत्थर भी ऐसा जिसका कलेजा फट गया।
क्या कहूं, कितना कहूं, कैसे कहूं
मैंने तो सिर्फ पढ़ा भर है
तो आज तक रो रहा हूं,

सोचो भला! जो उन शब्दों में जी रहा है,
आखिर वह जी कैसे रहा है,
जी भी रहा है या फिर
तिल तिल कर मर रहा है।

मकड़जाल

अजीब सी दुविधा में हूँ
ये कैसे मकड़जाल में फंस गया हूं,
जिसमें फँसने का तो
कोई औचित्य ही न था
फिर भी फंसकर रह गया हूँ
या यूं कहूँ खुद ही आकर फँस गया हूँ।

मगर अब जब निकलना चाहता हूँ तब
चाहकर भी निकल नहीं पा रहा हूँ,
जाल में जो हमसे पहले
किसी दुर्घटना वश आकर फँस गए थे
वे भी अब मुस्करा रहे हैं,

जाल में फँसकर भी
आजाद नहीं होना चाह रहे हैं
उल्टे मेरे पैरों में बेड़ियां डाल इतरा रहे हैं।

वो अब मुझे जाने नहीं दे रहे हैं
अपनी जिद भरे सद्भाव सम्मान से
भावुकता और अश्रुपूरित आँखो से
मुख्य द्वार पर अवरोध डाल

जैसे खुद शहंशाह हो रहे हैं
मुझे अपने साथ रखना चाहते हैं,
इसीलिए मेरे पैरों में शिला बाँध रहे हैं।

अपराधबोध

आजकल महसूस होता है
एक अजीब सा अपराधबोध,
पर अपराध का तो पता नहीं
शायद मैंने ऐसा कोई अपराध किया भी नहीं
न ही आप सब मुझे अपराधी मानते हैं।

फिर ये अपराध बोध कैसा?
शायद ये सजा है पूर्व जन्मों की
जब मैं बच गया रहा होऊंगा
अपने अपराध की सजा से
किसी षड्यंत्र, प्रभाव या सिफारिश से।

जो इस जन्म में जागृति होकर
मुझे आभास करा रहा है
पश्चाताप का दबाव बना रहा है।
मगर मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं
कि कौन और कैसा अपराध
कैसे करना होगा प्रायिश्चत,
ये तो सरासर अन्याय है।

चलो मान भी लूँ मैं खुद को अपराधी
पर सजा कौन तय करेगा,
सजा के बाद निर्दोष होने का
प्रमाणपत्र कौन देगा?
या सिर्फ ये मेरा वहम है
क्योंकि मैं जिसका अपराधी हूँ
आखिर वो कौन है?

या वो भी अपराध बोध से ग्रस्त है,
मैं अपराधी नहीं हूँ कहना चाहकर भी
शायद कह नहीं पा रहा है,
क्योंकि मेरा और उसका
तो कभी आमना सामना भी नहीं हुआ,
न ही हमारी जान पहचान, यारी दोस्ती है।

लगता है हम आप सब
इसी अपराध बोध का शिकार हैं,
अपने आप से लाचार हैं,
न तो हम अपराधी न ही आप पीड़ित हैं
फिर भी जीवन की ये कैसी विडम्बना है
हम सब अपराध बोध का शिकार हैं
जो अपना नहीं था मगर अब अपना है
बस उसी की पीड़ा की अनुभूति कर
अपराधबोध का शिकार हैं
शायद आज के परिदृश्य में
हम हों या आप, सबसे अधिक लाचार हैं।

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Author:

Sudhir Shrivastava
Sudhir Shrivastava

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.