Best Motivational Stories in Hindi

Last updated on: December 24th, 2020

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प्रेरणादायक कहानियाँ | Best Motivational Stories in Hindi

ज़िन्दगी में यूं तो बहुत गम हैं और ढेरों परेशानियां भी। हर इंसान की जिंदगी का कोई-न-कोई मकसद जरूर होता है। हर किसी का अपनी मंजिल को पाने का अपना-अपना तरीका भी है। यूं तो हमें अपना मुकाम खुद बनाना होता है, लेकिन जब कभी मंजिल पथ पर चलते हुए आपके कदम लड़खड़ने लगते हैं तो एक अच्छे दोस्त की जरुरत हमेशा ही मह्सूस होती है। यह दोस्त कुछ अच्छी मोटिवशनल कहानियां भी हो सकती हैं। ये मोटिवेशनल कहानियां आपमें नई ऊर्जा का संचार करती हैं।

नीचे दी गई मोटिवशनल स्टोरी उम्मीद है कि आपमें एक नई ऊर्जा का संचार जरूर करेगी।

मेहनत का सुख सबसे बड़ा
असलियत में ही जीवन का असली सुख
बुढ़िया का दयालु बेटा
मन की ताकत
नन्ही चिड़िया के सच्चे बोल
आलस का रोग
चालाकी चालाक से
मानसी की वो ईमानदारी भरी जिद और सफलता की मिठास
धुंधली नजरें और आईएएस बनने का वो सपना

मेहनत का सुख सबसे बड़ा

हिमालय के जंगलों में एक तोता और मैना रहते थे। एक दिन दोनों आपस में बातें करते-करते बहस पर उतर आए। दोनों मनुष्य जीवन में आने वाले सुख-दुख को लेकर बहस करने लगे।

तोता-  मैं तो कहता हूं कि जीवन में धन का सुख बड़ा होता है। धनवान व्यक्ति धन से सब सुख खरीद सकता है। अच्छा खाता-पीता है और स्वस्थ रहता है। सारा जीवन आराम में बीतता है।

मैना- मैं तो मेहनत का सुख सबसे बड़ा सुख मानती हूं। क्योंकि  मैंने देखा है कि मेहनती आदमी जितना शांत और सुखी जीवन जीता है वैसा जीवन तो कोई  धनवान जी ही नहीं सकता।

तोता -क्या तुम इसका कोई सबूत या उदाहरण  दे सकती हो?

मैना- हां, मैं तुम्हें इसका सबूत दे सकती हूं पर इसके लिए तुम्हें  मेरे  साथ  मैदानों में  चलना पड़ेगा।

तोता- हां मैं चलूंगा।

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मैना तोते के साथ उड़ते हुए जंगल से बहुत दूर एक गांव में आ पहुंची। गांव में एक आलीशान बंगला था। दोनों  उस बंगले की एक खिड़की पर आकर बैठ गए। वहां तोते ने देखा कि बंगले का मालिक बहुत बड़ा सेठ है। नौकर-चाकर और सब तरह के ठाट-बाट हैं  पर फिर भी सेठ सुखी नहीं है।मोटापे और अन्य बहुत सारे रोगों से घिरा हुआ है। 

सेठ – किस काम का धन और किस काम का आराम ?  शरीर रोगों का घर बन गया है। रो-रोकर जीवन बीत रहा है। मुझसे अच्छा तो वो गरीब मजदूर है जो मेहनत की रूखी-सूखी खाकर निरोग जीवन जीता है। यहां खाने को तो पकवान हैं पर भूख बिलकुल भी नहीं है।
दवाइयां ही खाकर जीना पड़ता है।

सेठ की हालत देखकर और उसकी सारी बातें सुनकर तोता सोचने लगता है कि शायद मैना सच कहती है कि धन का सुख सबसे बड़ा सुख नहीं है। मेहनत का सुख ही सबसे बड़ा सुख है। पर जब तक अपनी आंखों से न देख लूं, कैसे मान लूं? यही सोचकर तोता मैने से कहता है कि धन वाला उदाहरण तो तुमने दिखा दिया अब मेहनत वाला भी दिखा दो।

मैना- चलो ,मेरे साथ उड़ चलो। मैं तुम्हें एक दूसरे गांव  लेकर चलती हूं।

अब मैना उसे साथ लेकर एक दूसरे गांव की ओर उड़ चली जाती है । दूसरे गांव में पहुंचते-पहुंचते दोनों लगभग  शाम हो जाती है । मैना तोते को एक खेत में ले जाती है। वहां तोता देखता है कि एक मजदूर फावड़े से खेत की खुदाई कर रहा है। शरीर पसीने से तर- बतर है मगर फिर भी लगा हुआ है। सूरज ढलने तक वह मजदूर बिना रूके पूरे खेत को खोद डालता है। फिर सिर पर बंधा  गमच्छा खोलकर पसीना पोंछता है और फावड़ा कंधे पर रखकर घर की तरफ चल पड़ता है। तोता और मैना भी उसके साथ-साथ उड़ते जाते हैं।

कुछ देर बाद जब वह मजदूर अपने घर पहुंचता है तो उसकी पत्नी मुस्कराते हुए उसका स्वागत करती है।

पत्नी-आ गए जी , सारा काम  निपट गया क्या?

मजदूर- हां, काम तो सारा निपटा दिया , मगर भूख बहुत लगी है।खाने में क्या बनाया है? 

पत्नी- सब्जी तो कुछ थी नहीं इसलिए सूखी रोटियां ही बनाई हैं  प्याज के साथ खा लो।

मजदूर- ठीक है, जल्दी से ले आओ।

यह कहकर मजदूर  हाथ-मुंह धोकर एक चारपाई पर जाकर बैठ जाता है। उसकी पत्नी एक थाली में कुछ रोटियां और एक मोटा प्याज रखकर उसे पकड़ा जाती है। मजदूर बड़े ही मज़े में रोटियां खाता है।

मजदूर- वाह! खाना  खाकर आत्मा तृप्त हो गयी।अब तो बस शरीर को आराम चाहिए इसलिए सो जाता हूं ।

मजदूर खाना खाने के बाद वहीं उस बिना  बिस्तर वाली चारपाई पर लेटकर गहरी नींद सो जाता है।
तोता यह देखता है तो काफ़ी देर तक सोचता रहता है और फिर मैना से कहता है।

तोता- मैना ,तुम सच कहती हो।इस संसार में सबसे बड़ा सुख मेहनत का सुख है, क्योंकि मेहनत करने से शरीर नीरोग रहता है। सही से भूख लगती है और आदमी सही से खा-पीकर सो जाता है। उसे ज्यादा  ठाट-बाट की जरूरत ही नहीं होती।

मैना- अगर  सब इस बात को समझ जाएं तो सेहतमंद और सुखी रहें। पर यहां तो सब धन के पीछे पड़े हैं। सब आराम चाहते हैं। मेहनत तो कोई करना ही नहीं  चाहता।

तोता- इसीलिए तो निरोगी काया को तरसते हैं और रोग भोगते हैं।

मैना- तुम ठीक कहते हो… पर क्या अब अपने जंगल की ओर वापस उड़ चलें ?

तोता- हां,हां चलो…उड़ चलें।

उसके बाद दोनों अपने जंगल की ओर वापस उड़  जाते हैं।

कहानी से प्राप्त सीख: असली सुख केवल मेहनत से ही मिलता है ,धन से मिला सुख कभी असली सुख नहीं होता।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

असलियत में ही जीवन का असली सुख

● गोपाल नाम का सब्जीवाला 

 गोपाल नाम का  सब्जीवाला हमेशा अपने बेटे को यही समझाता था कि -“बेटा, अपनी हैसियत में रह कर जीना सीखो। दिखावे में कुछ नहीं रखा। एक गरीब  सब्जियां बेचकर अपने परिवार का पेट पालने वाले के लड़के हो सो उसी के लड़के बनकर रहो। किसी धनी व्यापारी या जमींदार के लडकों जैसा दिखावा करके कुछ फायदा न होगा। अंत में पछताना या दुःख उठाना पड़ेगा।” 

मगर उसका बेटा अनुराग था कि अपने पिता की हर बात को कानों पर से टाल देता था।उसकी दी सीख को मानकर कभी भी चलने की कोशिश नहीं करता था। धनी बाप का बेटा होने का दिखावा करने के लिए बाप की कड़ी मेहनत की कमाई को कपड़े-जूते तथा अन्य चीजों पर अंधा होकर उड़ा देता था। साथ ही अपने कालेज के दोस्तों में अपनी अमीरी का रौब जमाने के लिए भी खूब रुपया-पैसा खर्च करता था। इस तरह गोपाल जो भी कमाता था सब बराबर हो जाता था। उसके पास एक पैसा भी ऐसा नहीं बचता था कि आड़े दिनों में काम आ जाए।

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● काॅलेज की पढ़ाई छोड़ अनुराग का घर लौट आना

कुछ दिन अनुराग शहर में रहकर काॅलेज की पढ़ाई-लिखाई करता रहा और जैसे जी में आता पिता की मेहनत की कमाई को बर्बाद करता रहा। लेकिन समयबदलते देर नहीं लगती। एक दिन गोपाल की तबियत एकाएक ऐसी बिगड़ी कि उसने बिस्तर पकड़ लिया।उसकी लंबी बीमारी के कारण सब चौपट होता चला गया। सब्जियां बेचने का काम बंद पड़ गयाऔर घर में आमदनी के नाम पर कुछ भी नहीं बचा। बेटे अनुराग की फिजूल खर्ची के कारण पिता बचत के रूप में भी कोई पैसा जमा नहीं कर पाया था इसीलिए कर्ज लेने की नौबत तक आ गई।

गोपाल के लिए जब कर्ज मिल पाना भी मुश्किल हो गया तो उसने बेटे अनुराग को फोन करके कहा कि-” बेटा, तुम्हें अब आगे मैं बिलकुल भी न पढ़ा पाऊंगा। मेरी बीमारी के कारण मेरा काम-धंधा खत्म हो चुका है और मैं कर्ज के नीचे दब चुका हूं। इसलिए तुरंत अपने घर लौट आओ और आकर घर का काम-काज संभाल लो।”

पिता की बातें सुनकर अनुराग को जबरदस्त धक्का लगा और वह बिना किसी यार-दोस्त को अपने बारे में बताए ही रात की ट्रेन पकड़ कर शहर से अपने गांव चला आया।

● अनुराग सब्जियां बेचने को मजबूर 

अनुराग जब काॅलेज की पढ़ाई छोड़ कर घर लौटा तो उसने अपने पिता को बहुत बुरी हालत में पाया। पिता गंभीर रूप से बीमार था और उसे देखकर लगता था कि बस कुछ ही दिनों में मर जाएगा। उधर चिंता के कारण मां भी सूखकर कांटा हो गयी थी। माता-पिता दोनों की यह हालत देखकर अनुराग बहुत दुखी हुआ।
मां ने आंसू बहाते हुए अनुराग से कहा-” बेटा,तुमने कभी पैसा बचाने की नहीं सोची और न ही अपने पिता के पास इतना पैसा छोड़ा कि वह पैसा बचा पाते।

सब दिखावे की अमीरी में उड़ा दिया। अब दिखावा छोड़ कर वास्तविक जीवन जीने की आदत डालो , नहीं तो हम भूख से मर जाएंगे और तुम्हारे पापा बीमारी से। जिन लोगों से कर्ज लिया है वो भी इस घर से बाहर निकाल देंगे तो हम कहां जाएंगे? हम सड़क पर आ जाएंगे, बेटा।”

मां की बात सुनकर अनुराग कुछ ज्यादा नहीं बोल पाया। उसने मां की आंखों से आंसू पोंछते हुए बस इतना ही बोला-“मां, तुम चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। अब पापा की सब्जियां बेचने का काम मैं करूंगा।”

● दिखावा छोड़कर असलियत का जीवन 

अनुराग ने कभी सोचा भी नहीं था कि जीवन एकदम से ऐसे भी बदल जाता है व आदमी अपनी असलियत में  ही जीए तो ही अच्छा होता है। इसीलिए जब उसे अपनी झूठी अमीरी का चोला त्याग कर असलियत की जमीन पर पैर रखना पड़ा तो उसे बहुत तकलीफ हुई। उसने सब्जियां बेचने का काम करना चाहा तो उसके पास पैसे नहीं थे।

पिता ने पैसे उधार मांगने के लिए एक साहूकार के पास भेजा तो उसने पैसे देने से मना कर दिया। उलटे उस पर एक ताना भी कसा कि-” पढ़ा-लिखा, साहब जैसे कपड़े पहनने वाला तुम्हारे जैसा लड़का सब्जियां बेच पाएगा क्या ? तुम्हें  पैसे दिए तो तुम उन्हें फजूल में  ही खर्च करोगे।”

साहूकार की बातों ने तो अनुराग को अंदर तक हिला कर रख दिया। आज उसे एहसास हुआ कि अगर वह अपनी असलियत में जीता तो इस तरह के बोल और अपमान कभी न सहना पड़ता। साथ ही वह मेहनत से जीने और खाने-कमाने का हुनर भी सीख जाता। पैसे को दिखावे में खर्च करने के बजाय उसे बचाकर अपना बेहतर भविष्य बनाने पर खर्च कर सकता था।

अनुराग की अपनी इस गलती के कारण बहुत दुख उठाने पड़े और लोगों से काफी बेइज्जत भी होना पड़ा मगर उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी भूल को सुधारने और अपनी असलियत पर रहकर जीवन को बेहतर बनाने का दृढ़ निश्चय किया। जीवन में हुई भूल और उसके कारण मिले दर्द व अपमान ने उसे एक संघर्षशील इंसान बना दिया। उसने अपना महंगा मोबाइल फोन बेचकर अपने दम पर सब्जियां बेचने काम शुरू कर लिया और फिर दिन-रात मेहनत करने लगा।

● अनुराग के जीवन में सुख और कामयाबी 

अनुराग के स्वभाव में आए बदलाव और उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति व मेहनत ने वो रंग दिखाया कि कुछ ही दिनों में उसके पापा की बीमारी ठीक हो गयी और उनकी बीमारी के कारण जो कर्ज चढ़ गया था वो सबभी उतर गया। पापा भी सब्जियों के कारोबार में  अनुराग का हाथ बंटाने लगे।

अब अनुराग ने अपनी पढ़ाई-लिखाई पर दोबारा ध्यान देना शुरू किया और पापा के साथ मिलकर काम-धंधा करते हुए मेहनत से पढ़ने लगा। दिन-रात इतनी मेहनत से पढ़ाई की किकुछ ही सालों में आईएएस की परीक्षा पास करके भारत सरकार में उच्च प्रशासनिक अधिकारी के पद  पर नियुक्ति पाई।

कहानी से प्राप्त सीख: अगर हम अपनी असलियत में जीते हैं  तभी हमें जीवन में असली सुख और कामयाबी मिलते हैं।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

बुढ़िया का दयालु बेटा

○ कदमपुर गांव के दो गरीब परिवार 

बहुत पुरानी बात है जब राजा-महाराजाओं का जमाना था। कदमपुर नाम के गांव में एक गरीब बुढ़िया अपने बारह साल के बेटे के साथ रहती थी। उसके बेटे का नाम दीनू था और वही उस बुढ़िया का इकलौता सहारा था। बुढ़िया अपना और अपने बेटे का पेट पालने के लिए मिट्टी के खिलौने बनाकर उन्हें गली-गली में घूमकर बेचा करती थी। उन खिलौनों को बेचकर जो बनता था उसी में मां- बेटे का गुजारा चलता था।

उसी गांव में एक गरीब शिकारी भी रहता था। उस शिकारी के परिवार में उसके अलावा उसकी पत्नी और एक दस साल की बेटी शामिल थे। शिकारी रोज जंगल में शिकार करने जाता था और जो भी शिकार  मिलता था उसी के सहारे अपना व अपने परिवार का जीवनयापन करता था। इन दोनों परिवारों की हालत ऐसी थी कि कभी-कभार भूखा भी रहना पड़ जाता था।

○ शिकारी के परिवार पर भुखमरी की नौबत

एक बार शिकारी को कई दिनों तक जंगल से कोई भी शिकार नहीं मिला। वह शिकार की खोज में रोज जंगल में जाता और खाली हाथ लौट आता। शिकार न मिल पाने के कारण उसके परिवार के भूखे मरने की नौबत आ गई। वह खुद, उसकी पत्नी और और उसकी बेटी तीनों का भूख के कारण बुरी स्थिति में पहुंच गए। तीन दिनों तक तीनों के पेट में अन्न का एक दाना भी न गया।

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बेटी की स्थिति और भी खराब थी जिसे देखकर  शिकारी और उसकी पत्नी बहुत अधिक चिंतित हो गए। मगर फिर भी शिकारी ने धैर्य नहीं  खोया और वह चौथे दिन भी शिकार के लिए जंगल में निकल गया।

○ दीनू की शिकारी से मुलाकात

उस दिन भी शिकारी को कोई ऐसा शिकार नहीं मिला जिससे उसके परिवार के सभी सदस्यों को भरपेट भोजन मिल सके। हां, उसे शिकार के नाम पर एक हिरण का नवजात शिशु मिल गया। शिकारी ने न चाहते हुए भी उसे उठा लिया और फिर अपने घर की तरफ चल पड़ा। शिकारी चलते-चलते सोच रहा था कि शिकार है तो नन्हा-सा बच्चा जिसे मारकर खाना किसी महापाप से कम न होगा मगर अपने परिवार को मरने से बचाने के लिए यह महापाप तो करना ही पड़ेगा।

शिकारी यह सोचते हुए अपने घर की ओर चला जा रहा था कि तभी उसे रास्ते में उस बुढ़िया का बेटा दीनू मिल गया। दीनू शिकारी के पास  हिरण का नन्हा-सा बच्चा देखकर उससे पूछने लगा -” अरे ओ शिकारी चाचा, इतने छोटे से हिरन के बच्चे को क्यों पकड़ करले आए ? इसे तो इसकी मां के पास रहने देते ? अब इतने निर्दय हो गए हो क्या कि नन्हे दूध पीते बच्चों को भी मार डालोगे ? “

○ शिकारी की आंखों में आंसू  

दीनू की बात सुनकर शिकारी की आंखों में आंसू आ गए और वह बोला-“दीनू बेटा , इतने छोटे बच्चे का शिकार करना तो मैं  भी नहीं चाहता, पर क्या करूं मजबूरी है। तीन-चार दिनों से जंगल में कोई शिकार ही नहीं  मिला और इसी कारण मैं और मेरा परिवार भूख के कारण मरने की कगार पर पहुंच गए हैं। दस घरों में जाकर अनाज मांगा मगर किसी ने एक दाना भी नहीं दिया। आज भाग्य से यह हिरण का बच्चा मिल गया , शायद यही हमारे प्राण बचा ले !

यही  सोचकर इसे उठा लाया हूं । जानता हूं कि यह मेरे भूखे परिवार के लिए एक-दो निवाले से ज्यादा कुछ नहीं है, पर फिर भी इसे खाकर आज की रात तो मरने से तो बच ही जाएंगे। कल क्या होगा भगवान जाने !”

○ दीनू की शिकारी से विनती  

दीनू दयालु बालक था और इसी कारण उसे हिरण के बच्चे पर बहुत दया आई। अपनी इसी दया भावना से प्रेरित होकर उसने मन-ही-मन हिरण के बच्चे को शिकारी से मुक्त कराने का निश्चय किया। 
वह शिकारी से विनती करते हुए बोला- “देखो शिकारी चाचा,मैं तुम्हारी मजबूरी को समझता हूं। मैं चाहता हूं कि न तो तुम  भूखे रहो और न ही यह हिरण का बच्चा ही तुम्हारे हाथों मरे।

हम भी तुम्हारी तरह गरीब हैं  इसलिए हमारे  पास भी खाने का कुछ ज्यादा सामान नहीं है। घर में बस इतना आटा है कि तुम्हारा परिवार आज रात पेटभर खाकर चैन से सो सकेगा। मैं वह आटा आपको दे देता हूं और आप मुझे  यह हिरण का बच्चा दे दीजिए। मैं कल सुबह होते ही इसे जंगल ले जाऊंगा और इसकी मां को ढूंढ कर उसके हवाले कर दूंगा।

शिकारी ने दीनू की बात मान ली। उसने हिरण का बच्चा दीनू को दे दिया और दीनू ने घर में जितना भी आटा रखा था सारा उसको लाकर दे दिया। इस तरह उस रात शिकारी के परिवार को भरपेट भोजन मिल गया।

○ दीनू पर बूढ़ी मां की डांट

जब दीनू की मां को पता चला कि उसके बेटे ने एक हिरण के बच्चे को बचाने के लिए घर में रखा सारा आटा शिकारी को दे दिया है और आज उन दोनों को भूखे पेट सोना पड़ेगा तो उसे दीनू पर बहुत गुस्सा आया। उसने दीनू को बहुत डांटा मगर फिर जब  हिरणी के नन्हें बच्चे को देखा तो उसका सारा गुस्सा गायब हो गया और उसकी जगह मन में करुणा व स्नेह का सागर उमड़ पड़ा। उसने दीनू को सीने से लगा लिया और आंखों में आंसू भरकर कहने लगी- 

“तूने इस हिरण की जान बचाकर बहुत बड़े पुण्य का काम किया है, बेटा। मुझे तुम पर गर्व है। इस नन्ही-सी जान को बचाने के लिए हमें एक रात क्या कई दिन-रात भी भूखा सोना पड़े तो कोई गम नहीं होगा।”

दीनू अपनी मां की ये बातें सुनकर बहुत खुश हुआ और मां से बोला-” मां, वो मंदिर का पुजारी कहता है कि जो भगवान के बनाए पशु-पक्षियों पर दया दिखाता है न, भगवान उस पर अवश्य दया दिखाता है। देखना कल तुम्हारे सारे खिलौने बिक जाएंगे और फिर हम दोनों को पेटभर खाना खाने को मिल जाएगा। बस आज की रात ही तो भूखा सोना है!”

○ दीनू को उसकी दयालुता का पुरस्कार 

अभी रात के खाने का समय भी नहीं हुआ था कि गली में राजा द्वारा की गई मुनादी के बोल सुनाई पड़े।   मुनादी के बोल इस प्रकार थे कि-“राज्य की महारानी के पास एक हिरनी है जिसका नवजात शिशु कहीं खो गया है या उसे कोई उठा ले गया है।जो व्यक्ति हिरणी को उसका बच्चा वापस लाकर देगा महारानी जी की तरफ से उसे सोने की सौ मुहरें इनाम में दी जाएंगी।” 

जैसे ही दीनू और उसकी मां ने यह मुनादी सुनी तो दोनों के चेहरे खिल उठे। दीनू ने तुरंत हिरण के बच्चे को उठाया और अपनी मां को साथ लेकर राजमहल जा पहुंचा। जैसे ही हिरणी ने उस बच्चे को देखा तुरंत आगे आकर उसे स्नेह से चाटने लगी। बच्चा भी भूख से व्याकुल था और इसीलिए हिरणी के स्तनों को ढूंढ कर दूध पीने में जुट गया ।

महारानी हिरणी से उसके बच्चे को मिला कर बहुत खुश हुईं। उसने दीनू और उसकी मां को पेटभर खाना खिलाया और फिर सोने की सौ मुहरें इनाम में देकर उन्हें राजमहल से खुशी-खुशी विदा किया।

○ शिकारी ने छोड़ा जीवों का शिकार करना

दीनू ने  सोने की सौ मुहरें लेकर अपनी ही गरीबी का इलाज नहीं किया बल्कि उसने शिकारी का जीवन भी  बदल दिया। उसने शिकारी को पचास सोने की मुहरें दीं ताकि वह जीवों का शिकार करना छोड़ कर कोई  और काम-धंधा करके अपने परिवार का पेट पालने लगे। शिकारी उस धन से कुछ खेत खरीद कर उनमें खेती करने लगा और उसने जीव हत्या करना सदा के लिए छोड़ दिया।

कहानी से प्राप्त सीख: जो ईश्वर के बनाए पशु-पक्षियों पर दया दिखाता है वह हमेशा ही ईश्वर के प्रेम व कृपा का पात्र बनता है।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

मन की ताकत 

○ राघव की मां का विश्वास 

राघव छठी कक्षा में पढ़ता था और पढ़ाई-लिखाई में काफी होशियार था। इसके अलावा उसमें और भी कुछ खास गुण थे जैसे कि सदा सच बोलना, किसी काम में हार न मानना, बार-बार प्रयास करना, माता-पिता का कहा मानना आदि। राघव को ये सभी गुण उसकी मां ने दिए थे।

उसकी मां उसे बहुत छोटी-सी उम्र से ही सिखाती आई थी कि मनुष्य की असली ताकत उसके शरीर में नहीं बल्कि उसके मन में बसती  है। इसीलिए अगर मनुष्य मन की ताकत का इस्तेमाल करना सीख ले तो जीवन के हर क्षेत्र में उसकी जीत  निश्चित हो जाए।

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राघव की मां का विश्वास था कि शरीर की सारी ताकत मन में होती है और जब मन अपनी ताकत दिखाता है तो शरीर की ताकत अद्भुत कमाल कर दिखाती है।

○ राघव की दौड़ प्रतियोगिता को लेकर चिंता 

हालांकि कि राघव ने कभी भी हार मानना नहीं सीखाथा और वह हमेशा जीत की सोच रखता था। मगर  फिर भी इस साल स्कूल में होने वाली दौड़ प्रतियोगिता में  अपनी जीत को लेकर वह थोड़ा चिंतित था,क्योंकि अच्छे से तैयारी जो नहीं कर पाया था। इसी कारण  उसने अपनी मां से कई बार कहा भी था कि इस बार मैं दौड़ प्रतियोगिता में हार जाऊंगा, क्योंकि मैं कुछ खास तैयारी नहीं कर पाया हूं।

पर जब भी उसने अपनी मां से यह बात कही उन्होंने हर बार यही समझाया कि मन में जीत का विश्वास एवं  संकल्प बना कर रखो। अगर ऐसा करोगे तो अवश्य जीत जाओगे। यदि हार के डर से मन की ताकत को खो दिया तो फिर जीत के करीब होते हुए भी हार जाओगे। अपनी मां कि इसी बात को सुनकर राघव अपने मन में जीत का कुछ हौसला बनाए हुए था।

○ राघव की करिश्माई जीत 

धीरे-धीरे दौड़ प्रतियोगिता का दिन भी आ पहुंचा और नियत समय पर दौड़ शुरू भी हो गई। जैसे ही दौड़ शुरू हुई राघव अपने पूरे जोश से दौड़ा और हवा से बातें करते हुए सबसे आगे निकल गया। मगर फिर बीच रास्ते में न जाने उसका पैर किस चीज़ से टकराया कि वह जमीन पर औंधे मुंह जा गिरा।जमीन पर गिरते ही राघव को लगा कि शायद वह अब उठ नहीं पाएगा और अब उसका हारना निश्चित है। मैदान में उपस्थित लोगों को भी यही लगा कि अब राघव उठकर दौड़  नहीं  पाएगा।

मगर फिर जैसे ही राघव को अपनी मां की वह बात याद आई कि मनुष्य की असली ताकत शरीर में नहीं बल्कि उसके मन में बसती है और वह जाग जाए तो मनुष्य कभी हार ही नहीं सकता। साथ ही उसे लगा कि उसकी मां उससे चीख-चीखकर कह रही है कि – “राघव उठ। हिम्मत मत हार, शरीर की ताकत छोड़  और मन की ताकत का इस्तेमाल कर, बेटा। उठ,जल्दी उठ और जीत कर दिखा।” 

जैसे ही राघव को यह एहसास हुआ उसके शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी।वह तुरंत उछल कर उठा और फिर सबको दौड़ता ही दिखाई दिया। इस बार वह आंधी की तरह दौड़ा और देखते-ही-देखते फिर से सबसे आगे निकल गया और दौड़ में प्रथम स्थान पर  आ गया। उसका यह करिश्मा देखकर सबने दांतों तले उंगली दबा ली।

○ राघव जिन्न के कारण भयभीत

राघव दौड़ प्रतियोगिता में प्रथम तो आ गया था मगर आया कैसे था यह बात सबके लिए आश्चर्य की घटना थी। देखने वाले तो इसे कोई दैवीय करिश्मा समझ रहे थे। मगर राघव इसे किसी आत्मा या जिन्न का काम  समझ रहा था जो एकाएक उसके शरीर में घुस गया था और उसे सबसे आगे उड़ा ले गया था। यही सोचकर  वह असमंजस में पड़ा हुआ था और साथ ही मन में डरा हुआ था कि कहीं सचमुच कोई जिन्न तो उसके शरीर में न घुस गया हो और अब भी मौजूद न हो।

इसी कारण राघव ने न तो अपने दोस्तों में ही कोई दिलचस्पी दिखाई तथा न ही अपनी जीत की कोई  खास खुशी मनाई। भारी मन से ट्रॉफी ली और अपने घर की ओर रवाना हो गया। 

○ राघव अपनी मां से 

जैसे ही राघव ट्रॉफी लेकर अपने घर पहुंचा तो उसकी मां उसकी ट्रॉफी देखकर फूली नहीं समाई। मगर राघव ने जरा भी खुशी प्रकट न की। उसने ट्रॉफी को अपनी पढ़ने की मेज़ पर रखा और मां से लिपट कर उन्हें सारी घटना के बारे में बताया तथा फिर पूछा- 

मां, क्या सचमुच मेरे शरीर में कोई जिन्न  घुस गया है? क्योंकि  जिस तरह हारते-हारते मैं एकाएक जीता हूं उसे देखकर तो यही लगता है कि किसी जिन्न ने मेरे शरीर में प्रवेश करके मुझे जिताया है। अगर  ऐसा नहीं होता तो मेरे भीतर इतनी ताकत  कहां से आती?

○  मां राघव से

राघव की भोली बातें सुनकर पहले तो मां खूब हंसी और राघव के जी भरकर लाड़ लड़ाए। फिर थोड़ा गंभीर होकर उसे समझाया-

देखो बेटा , न तो तुम्हारे साथ कोई करिश्मा हुआ है और न ही किसी आत्मा या जिन्न ने तुम्हारे शरीर में  प्रवेश करके तुम्हें जीत हासिल कराई है। ये जो जीत  तुम्हें मिली है ये तुम्हें  तुम्हारी मन की ताकत ने दिलाई है। क्योंकि जब तुम्हें  शरीर की शक्ति ने मायूस कर दिया और तुमने मन की ताकत के बारे में सोचा और साथ ही मेरी दी सीख को बार-बार याद किया तो सचमुच ही तुम्हारे मन की ताकत जाग गई। 

उसी ताकत के बल पर तुमने यह सब कर दिखाया। शरीर और मन दोनों की ताकत ने मिलकर तुम्हें जीत के लिए तूफानी बल दिया। तुम्हारे उसी बल को सबने करिश्मे के तौर पर और तुमने जिन्न के रूप में  देखा। इसलिए भूल जाओ कि तुम्हारी जीत किसी और की देन है। यह तुमने खुद हासिल की है, अतः अपनी जीत की खुशी मनाओ इस पर संदेह मत करो।

मां की बात सुनकर राघव के मन का सारा भ्रम जाता रहा और साथ ही उसने मन की ताकत का रहस्य भी समझ लिया।

कहानी से प्राप्त सीख: शरीर के हार मानने पर भी अगर मन जीतने की ठान ले तो जीतने से कोई रोक ही नहीं सकता।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

नन्ही चिड़िया के सच्चे बोल

○ जंगल में सबकी प्यारी नन्ही चिड़िया 

पहाड़ की तलहटी में एक छोटा-सा जंगल था। उस जंगल के बीचोंबीच एक विशाल जलाशय था। उस जलाशय के आसपास घने पेड़ों पर तरह-तरह के पक्षी घोंसले बना कर रहते थे। उन्हीं घोंसलों में एक चिड़िया परिवार भी था। उसमें एक नन्ही-सी सुनहरी चिड़िया थी। नन्ही चिड़िया सबकी प्यारी चिड़िया थी, क्योंकि  भगवान ने इस चिड़िया को मधुर कंठ और तेज बुद्धि  दी थी।

उसके ये गुण सबका मन मोह लेते थे। जब वह मधुर स्वर में गीत गाती थी या फिर बात करती थी तो सुनने वाला क्रोध या चिंता में होते हुए भी शांत और शीतल होकर मुस्कराने लगता था। उसकी बुद्धि की भी सब प्रशंसा करते थे,क्योंकि वह जो भी भविष्य वाणी करती थी वह सच हो जाती थी।सबको नेक सलाह देती रहती थी और उसकी सलाह सबके लिए लाभदायक सिद्ध होती थी। इसीलिए सारे पक्षी उसको बहुत प्यार करते थे। या यूं कहिये कि वह सब पक्षियों की प्यारी चिड़िया थी।

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○ जंगल में तेज बारिश के साथ आंधी-तूफ़ान 

एक बार गर्मियों में तेज बारिश के साथ भयंकर आंधी-तूफान आया और बेचारी नन्ही चिड़िया तूफ़ान और बारिश में फंस गयी। वह आंधी-तूफ़ान में रास्ता भटक गयी और जंगल के बाहर एक गांव की तरफ आ पहुंची। जब बारिश और आंधी-तूफ़ान थमा तो उसने खुद को एक घर के आंगन में पाया। वह पंख फड़फड़ाते हुए आंगन में रखे भूसे के ढेर पर बैठ गयी।

○ किसान-पुत्र अपनी पत्नी से 

नन्ही चिड़िया जिस घर के आंगन में आकर बैठी थी वह घर किसी किसान का था। जब वह वहां आकर बैठी तो किसान पुत्र अपनी पत्नी से क्रोधवश बहुत ही कड़वे वचन बोल रहा था और वह उसके कटु वचन खामोशी से सुने जा रही थी। किसान ने अपने बेटे को कड़वे बोल बोलने से मना किया तो वह उसको भी गुस्से में बुरा-भला बकने लगा। बेचारा बूढ़ा बाप अपमानित होकर चुप ही हो गया। नन्ही चिड़िया को किसान पुत्र पर बहुत गुस्सा आया।

○ नन्ही चिड़िया किसान पुत्र से

 नन्ही चिड़िया किसान पुत्र को सीख देने की  सोच कर अपने मीठे स्वर में गीत गाने लगी-
“जब भी बोल मीठा बोल…कड़वा बोल कभी मत बोलकड़वा बोलेगा तो पछताएगा …हां… हां…पछताएगा।क्रोध और कटुवचन सबके  दुख का कारण बनतेहै समय… दे छोड़ इन्हें… वर्ना कठोर सज़ा पाएगा।।”

○ बूढ़ा किसान नन्ही चिड़िया से

 नन्ही चिड़िया का गीत सुनकर बूढ़ा किसान कहने लगा कि- चिड़िया रानी तुम सच कह रही हो। क्रोध और कड़वे बोल बोलना सबको दुख देता है और बोलने वाला अंत में बहुत पछताता है। इतना ही नहीं घोर सज़ा भी पाता है। पर मेरे इस मूर्ख बेटे में इतनी समझ कहां कि अपनी इस बुराई को त्याग दे।

 मगर किसान पुत्र पर चिड़िया के मधुर स्वर का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। उलटे उसे चिड़िया पर बहुत गुस्सा आया। साथ ही अपने पिता को चिड़िया की बड़ाई करते देखकर वह और अधिक जलभुन गया। उसने क्रोध में भरकर एक पत्थर उठाया और चिड़िया पर दे मारा। किस्मत से चिड़िया बाल-बाल बच गयी और उसने वहां से उड़ जाने में ही अपनी भलाई समझी।

○ किसान पुत्र की गरीब आदमी से भेंट

नन्ही चिड़िया के वहां से उड़ जाने के बाद किसान पुत्र अपने खेतों की ओर चला गया। जब वह अपने खरबूजों के खेत की तरफ गया तो उसे वहां एक गरीब आदमी मिला। उस आदमी ने किसान पुत्र से बड़े ही  प्रेम के साथ कहा- ” किसान भाई, मैं यहां का राजा हूं  और आज प्रजा का हालचाल जाने के लिए निकला था। इधर तुम्हारे खेत की तरफ आया तो देखा कि खेत में बहुत अच्छे और पके-पके खरबूजे लगे हैं। मेरा खरबूजा खाने का बड़ा ही मन है। तुम मेरे लिए कोई अच्छा-सा खरबूजा लेकर आओ।”

उस गरीब आदमी को देखकर किसान पुत्र को यकीन नहीं हुआ कि राजा ऐसे भेष में भी हो सकता है। इसीलिए उसने उसको बहरूपिया समझ लिया और उसकी इतनी-सी बात पर ही ताव में आ गया। फिर बिना कुछ सोचे-समझे ही उसका अपमान करते हुए बोला-” अगर राजा तेरे जैसा गरीब होता है तो उसे कुएं में डूब मरना चाहिए। थू ऐसे राजा पर! और तुम गरीब भिखारी कहीं के मुझे आदेश देते हो कि मैं  तुम्हारे लिए  खरबूजा लाऊं! तुम  खरबूजे की जगह गोबर क्यों नहीं खा लेते! ” 

○  राजा किसान पुत्र से 

किसान पुत्र के कटु वचन सुनकर राजा को बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा-“क्यों भाई , मैंने ऐसी  कौन-सी गाली दे दी थी तुम्हें कि तुम क्रोध में लाल होकर मेरा अपमान करने लगे। मैंने एक खरबूजा ही तो मांगा था और मैं तुम्हारा सच में राजा हूं इसलिए तुम्हें एक खरबूजा लाने का आदेश दिया था। क्या तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि राजा से कैसे पेश आना चाहिए और संसार में किसी को भी कड़वे बोल नहीं  बोलने चाहिए। तुम्हें तो सबक सिखाना ही पड़ेगा।”

○ किसान पुत्र को पचास कोड़ों का सबक

राजा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि तभी वहां राजा के कुछ सैनिक आ पहुंचे।उन्हें देखते ही किसान पुत्र  समझ गया कि आज तो उसने सचमुच राजा को ही अपमानित कर दिया है। इसी कारण वह डर गया और राजा के पैरों में गिरकर  माफ़ी मांगने लगा। मगर  राजा ने उसे माफ़ नहीं किया।

सैनिक किसान पुत्र को गिरफ्तार करके राजमहल में  ले गए और राजा के आदेश से लोगों की भीड़ में  खड़ा करके उसके नंगे बदन पर पच्चास कोड़े बरसाए गए  ताकि वह भविष्य में कभी किसी को अपने कड़वे  बोलों से आहत करने से पहले हज़ार बार सोचे। 

जब किसान पुत्र कोड़ों की मार सह रहा था तब उसे रह -रहकर उस नन्ही चिड़िया के वही बोल याद आ रहे थे जो उसने उसको समझाने के लिए एक गीत के रूप में  बोले थे। साथ ही वह उस नन्ही-सी चिड़िया की बात पर ध्यान न देकर भी बहुत पछता रहा था।

सीख: हमें सबसे मधुर या मीठे बोल बोलने चाहिए, कटु या कड़वे बोल कभी किसी से भी नहीं बोलने चाहिए।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

आलस का रोग

भावपुर गांव में मोहन नाम एक बालक रहता था। मोहन के पिता जगदीश एक मेहनती किसान थे। जगदीश जितना मेहनती था उसका बेटा मोहन उतना ही आलसी और कामचोर था। न तो ढंग से पढ़ता-लिखता था और न ही घर या खेत के किसी काम में  हाथ बंटाता था।जब भी कुछ काम करने को कहा जाता तो तुरंत बहाना बना कर टाल देता। खाना, खेलना और सोना ही उसे आता था। मेहनत और समझदारी  से तो उसका दूर-दूर का भी नाता नहीं था। उसके इसी स्वभाव के कारण माता-पिता हमेशा चिंता करते रहते थे।

एक दिन पिता ने पुत्र को समझाया 

देखो मोहन बेटा, न तो तुम  पढ़ाई-लिखाई में ही मेहनत करते हो और न ही घर या खेत के ही किसी  काम में मेहनत करने की सोचते हो। तुम पूरी तरह से आलस के रोग से ग्रस्त हो गए हो। अगर ऐसा ही रहा तो तुम्हारा भविष्य खराब होगा। तुम न तो पढ़-लिखकर ही कुछ बन पाओगे और न ही खेतीबाड़ी करके ही गुजारा करने के लायक  रहोगे। इसलिए अभी भी समय है कि मेहनत का गुण सीख लो।

पिता ने जब भी मोहन को समझाने की कोशिश की  उसने उनकी हर बात को कानों पर से टाल दिया और  अपनी बुरी आदत को कभी भी सुधारने की कोशिश नहीं की। सही मानो तो आलस के रोग ने उसे निकम्मा बना दिया और घर वालों को उससे कोई उम्मीद नहीं रही।

चींटी और चिड़िया के बच्चों की बातें 

एक दिन मोहन और उसके पिता खेत पर गए। उस दिन गरमी बहुत थी इसीलिए मोहन जामुन के पेड़ घनी छाया में बैठकर खेलने लगा और उसके पिता खेत में उगाई मूंग से पकी-पकी सूखी फलियां इकट्ठी  करने में  लग गए। धूप और पसीना सहकर भी काम  में  लगे रहे। 

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जामुन के पेड़ के नीचे खेलते-खेलते अचानक मोहन की नज़र चींटी और चिड़िया के बच्चों  पर पड़ीं।वे दोनों ऊंची आवाज़ में बातें करने में मग्न थे।

चींटी का बच्चा चिड़िया के बच्चे से

हम चींटियों के बच्चों को कोई मेहनत करना और अपने  माता-पिता के काम में उनकी मदद करना कोई  सिखाता नहीं है, बल्कि हम खुद सीख जाते हैं। अपने  माता-पिता को देख-देखकर खुद ही मेहनत करने लग जाते हैं। आलस और सुस्ती तो हमें पता भी नहीं कैसी होती है! सारा दिन हंस-हंसकर काम करते हैं और  इसी कारण हमारे माता-पिता को हम पर गर्व है और  वे हमसे बहुत खुश रहते हैं।

चिड़िया का बच्चा चींटी के बच्चे से

तुम बिलकुल ठीक कहते हो।हम चिड़िया के बच्चे भी बहुत  मेहनती होते हैं और  हमारे माता-पिता भी हमसे बहुत खुश रहते हैं। वे तो हमें बस उड़ना भर सिखाते हैं फिर उसके बाद तो हम अपनी मेहनत से जीना सीख जाते हैं। आलस और सुस्ती कैसे होते हैं हमें इसका अनुभव जीवन में कभी हो ही नहीं पाता।

चिड़िया का बच्चा थोड़ा मुंह बनाकर

उधर इंसान के बच्चे उस मोहन को तो देखो कितना  आलसी और कठोर बालक है! पिता तो धूप में  मेहनत कर रहे हैं और यह पेड़ की छाया में आराम कर रहा है। ऐसे इंसानों के बच्चों से तो हम जानवरों के बच्चे अच्छे हैं! 

मोहन उन दोनों की बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उसी समय अपने आलस के रोग छुटकारा पाने के लिए बेचैन हो उठा। उसने चींटी और चिड़िया के बच्चों से कहा।

मोहन चींटी और चिड़िया के बच्चों से 

दोस्तो, तुम दोनों ने मुझे जो सबक सिखाया है मैं उसके लिए तुम्हारा जीवन भर आभारी  रहूंगा और भविष्य में  सदा तुम्हारे जैसा बने रहने की कोशिश करूंगा। आज से मैं भी  मेहनत करूंगा और अपने माता-पिता के  काम में हाथ बंटाऊंगा। खूब पढ़-लिखकर उनका ना ऊंचा करूंगा।

यह कहकर मोहन तुरंत उठकर मूंग के खेत में जाकर  अपने पिता के साथ मिलकर मूंग की फलियां इकट्ठी करने के काम  में लग गया। उस दिन के बाद से उसने आलस का रोग सदा के लिए त्याग दिया और उसके माता-पिता उससे बहुत खुश रहने लगे।

सीख: आलस का त्याग किए बिना जीवन में कोई सुख प्राप्त नहीं होता है।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

चालाकी चालाक से

गांव के पुराने घर में

गांव में एक बहुत ही पुराना घर था। घर वर्षों से खाली पड़ा था और उसे कई तरह के आवारा जानवरों ने अपना ठिकाना बना रखा था। उन्हीं आवारा जानवरों में सबसे प्रमुख स्थान एक बूढ़े कुत्ते का था। कुत्ते का नाम कालू था और वह अक्सर उस घर के आंगन में खड़े नीम के पेड़ के नीचे आराम किया करता था। उसका अधिकांश समय नीम के पेड़ के नीचे ही गुजरता था। 

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उस नीम के आसपास ही चूहों के अनेक  बिल थे और उनमें बहुत से चूहे रहते थे। उन्हीं चूहों में  अपना भोजन तलाशने के लिए पड़ोस की कबरी बिल्ली रोज वहां चली आती थी। कबरी बिल्ली किसी-न-किसी चूहे को अपना शिकार बना ही लेती थी।मगर वहीं एक मोटा चूहा भी रहता था जो बहुत निडर और चालाक था। मोटू चूहा अक्सर कबरी को चिढ़ाता रहता था और इसी कारण उसका खास दुश्मन बन गया था। अब कबरी उसे सबक सिखाने का अवसर ढूंढती रहती थी।

कबरी मोटू चूहे से

सुन बे मोटू , बेटा कब तक बचेगा? एक-न-एक दिन तो मैं तुझे अपना शिकार बना ही लूंगी। जिस दिन तू मेरे पंजों के नीचे आएगा न तो तुझे तेरी  नानी याद आ जाएगी। फिर देखना चटखारे ले लेकर खाऊंगी तुझे बच्चू।

मोटू कबरी से

कबरी मौसी,मुझे पकड़ने के सपने मत देखा करो, मैं तुम्हारे हाथ कभी नहीं आने वाला और आ भी गया तो  भी तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी, क्योंकि मेरे पास तुमसे बच निकलने का जादू है। 
यह कहकर मोटू चूहा इधर-उधर दौड़-दौड़ कर कबरी बिल्ली को चिढ़ाने लगा। उसने कबरी को इतना  सताया कि वह गुस्से में  लाल होकर उसके पीछे  दौड़ी मगर मोटू झट से अपने बिल में जा घुसा। बेचारी  कबरी ने अपना माथा पीटकर रह गयी।

कई दिनों बाद एक दोपहर में

कई दिनों के बाद एक दोपहर को कबरी बिल्ली लंगड़ा कर चलती हुई उस पुराने घर में आई। जब वह आई तब कालू कुत्ता नीम के पेड़ के नीचे सो रहा था और  मोटू चूहा कालू के आसपास ही खेल रहा था। जब उसने कबरी को अपनी अगली एक टांग उठाकर लंगडा-लंगड़ा कर धीमे-धीमे चलते देखा तो उसने सोचा कि जरूर कबरी कोई चाल चलने की कोशिश कर रही है। अतः क्यों न उसके पास जाकर सच जानने की कोशिश करूं।

मोटू निडर तो था ही, सो बिना डरे कबरी के काफ़ी  नजदीक पहुंच गया। मगर कबरी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। यह देखकर मोटू चूहे का डर खुल गया  और वह चलते-चलते कबरी के काफी नजदीक जा पहुंचा। जैसे ही वह कबरी के पास गया वह तुरंत मुड़कर उस पर झपट पड़ी। चूहे ने दौड़कर उससे बचने की कोशिश भी की मगर रास्ते में पड़े एक पत्थर से टकराने के कारण उसके पंजों में फंस ही गया।

कबरी  बिल्ली मोटे चूहे से

अब बोल बेटा मोटू , मुझसे बचकर कहां भागेगा?आज तो मैं तुझे खाकर ही दम लूंगी। बहुत सताया है तूने शरारती कहीं के !तुझे पकड़ने के लिए मुझे  लंगड़ा बनने की चाल चलनी पड़ी। आखिर फंस ही गया ना मेरी चाल में। अब बोल कैसे बचेगा?

मोटा चूहा कबरी बिल्ली से

रहने दे कबरी मौसी,  मैं तेरी चाल में नहीं फंसा बल्कि मैं तो उस पत्थर से टकराने के कारण तेरे हाथों लग गया। अब तुझे खाना  हो तो मुझे जल्दी खा ले ,तड़पा मत। मोटू चूहा सामने मौत देखकर बहुत डर गया था मगर फिर भी हिम्मत और हौसला रखे हुए था।

कबरी बिल्ली मोटे चूहे से

ऐं…ऐं…तुझे मरने की इतनी जल्दी!  अभी तो मुझे  तेरा  वो जादू देखना है जो तू बार -बार कहता था कि-मौसी तुझसे बचने के लिए तो मेरे पास जादू है!  कहां है रे मोटू वो जादू? दिखा ना ? बचा ले न खुद को?

मोटू चूहा कबरी बिल्ली से 

चूहा अंदर ही अंदर बहुत डर गया था मगर फिर भी  हिम्मत रखकर संकट से बचने का उपाय सोचते हुए  कहने लगा- बिल्ली मौसी, मैं तुम्हें  अपना जादू तो दिखा सकता हूंं, पर एक शर्त पर। पहले तुम  पूरा  जोर लगा कर चार बार अपना ‘म्याऊं-म्याऊं ‘, बोलो तो ?

चूहे को पंजों नीचे दबाकर कबरी भी कुछ घमंडी हो गयी थी इसीलिए बिना कुछ सोचे-समझे ही चूहे को खुश करने के लिए ‘म्याऊं- म्याऊं’ का शोर  मचाने लगी।

कालू कुत्ते की नींद में विघ्न 

उसके शोर मचाने से नीम के नीचे सो रहे कालू कुत्ते की नींद विघ्न पड़ गया तो वह क्रोध में भौंकते हुए  बिल्ली की ओर दौड़ा। उसे अपनी ओर आते देख बिल्ली अपनी जान बचाने के लिए तुरंत  दीवार फांद कर गली में कूद गयी और  मोटा चूहा जैसे ही  बिल्ली के चंगुल से आजाद हुआ भागकर अपने बिल में जा घुसा। इस तरह सच में उसकी हिम्मत व चालाकी  उसकी जान बचाने का जादू बन गयी।

कहानी से प्राप्त सीख- जो विपत्ति के समय हिम्मत और समझदारी से काम लेते हैं विपत्ति उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।

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लेखक: कृष्ण कुमार दिलजद

मानसी की वो ईमानदारी भरी जिद और सफलता की मिठास

पापा आज रिटायर हो गए थे। घर आने पर उनका चेहरा मायूस दिख रहा था। जाहिर सी बात थी इतने लंबे समय तक जिनके साथ काम किया, उनसे बिछड़ने का तो गम होना ही था। हालांकि, एक और बड़ी वजह थी इस निराशा की। आर्थिक तौर पर अब परेशानियां पैदा होने वाली थीं।

मानसी अपने पिता के चेहरे पर उभर रही मायूसी को साफ तौर पर देख पा रही थी। वह भी अपने पिता के साथ चिंतित होने लगी थी। उसके मन में यही ख्याल आ रहा था कि पापा ने जितना भी कमाया, अधिकतर पैसा मम्मी के इलाज में ही खर्च हो गया। अब तो पेंशन के रूप में आधी सैलरी ही मिलेगी। गुजारा करना अब और कठिन हो जाएगा।

बस यही सोचते-सोचते मानसी ने ठान लिया कि कम-से-कम अपना खर्च तो वह अपने पापा से नहीं मांगेगी। सोच लिया उसने कि करना तो अब कुछ अपने दम पर है। कोई-न-कोई नौकरी तो अब करनी ही पड़ेगी। मास्टर्स मानसी का पूरा हो गया था। रिजल्ट आने का इंतजार था।

उसका झुकाव मीडिया की ओर हो रहा था। अच्छा लिख लेती थी। सोचा कि क्यों न किसी अखबार में नौकरी की कोशिश की जाए। मानसी ने पता लगाना शुरू किया। इसी दौरान उसे पता चला कि एक अखबार में वैकेंसी आई है। वह भी अपने दोस्तों के साथ इंटरव्यू देने के लिए पहुंच गई।

तभी फोन आ गया कि मम्मी की तबीयत खराब है। सब कुछ छोड़ कर मानसी घर की तरफ दौड़ गई। मम्मी की सांसें फूल रही थीं। अस्पताल ले जाने की तैयारी हो रही थी। एंबुलेंस भी आ गई थी, लेकिन फिर मम्मी कहने लगी कि नहीं-नहीं अब मुझे आराम है। हॉस्पिटल जाने से मम्मी ने मना कर दिया। वह भी शायद यही सोच रही थी इतना पैसा पहले से ही मुझ पर खर्च हो चुका है। अब तो पति भी रिटायर हो गए हैं और कितना खर्च करवाऊं।

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मम्मी घर पर ही रह गई। धीरे-धीरे उन्हें आराम मिल गया। मानसी पापा से बोली, पापा मैं बस एक-दो घंटे में आ रही हूं। कह कर घर से निकल गई। अखबार के दफ्तर पहुंच गई। वहां पता चला कि इंटरव्यू की प्रक्रिया पूरी हो गई है। फिर भी मानसी ने अनुरोध किया। ऐसे में उसे एक मौका दिया गया। अगले दिन से ऑफिस आने के लिए कह दिया गया। संपादक ने कहा कि एक महीना बतौर प्रक्षिशु काम करना पड़ेगा। काम अच्छा रहा तो पक्की नौकरी हो जाएगी।

मानसी घर पहुंची। किसी तरीके से घरवालों को मनाया। घरवाले सुरक्षा को लेकर बड़े चिंतित थे। फिर पापा मान गए। सोचा कुछ तो पैसे घर में आ जाएंगे।

मानसी अगले दिन से ऑफिस जाने लगी। मानसी ने जितना सोचा था यह काम इतना भी आसान नहीं था। सुबह बैठक होती थी। 10 बजे पहुंचने के साथ ही उस दिन के आर्टिकल को लेकर आईडिया देना होता था। फिर दिन भर के कार्यक्रमों के असाइनमेंट मिलते थे। यहां-वहां जाकर खबर जमा करना। जो बीट मिली है, उससे संबंधित खबरें ढूंढना। शाम 4 बजे ऑफिस पहुंच जाना। यहां अपनी खबरें लिखना। 8 बजे तक रात काम करना। 10 बजे तक रात में घर पहुंचना। यह उसकी रोज की दिनचर्या बन चुकी थी।

बेटी के रात में घर लौटने की वजह से परिवार वाले बड़े चिंतित रहते थे। बड़ा दबाव बन रहा था कि वह नौकरी छोड़ दे। फिर भी किसी तरीके से मानसी ने एक बार फिर से अपने घर वालों को मनाया। मानसी अपने काम में लगी रही। धीरे-धीरे ऑफिस में उसके काम को पसंद किया जाने लगा। मानसी की लेखनी धीरे-धीरे अच्छी होती जा रही थी। हर ओर से उसे तारीफें मिलने भी शुरू हो गई थीं।

मानसी को लगा कि सबकुछ अब ठीक होता जा रहा है। अब पैसे भी आने लगे थे। मानसी अपना खुद से खर्च निकाल रही थी।

हर दिन की तरह मानसी एक रात घर लौट रही थी। उस वक्त रात के सवा 10 बज रहे थे। मानसी ऑटो रिक्शा से उतरी और अपनी गली में पैदल अपने घर की ओर बढ़ने लगी। तभी मानसी को लगा कि कोई उसके पीछे-पीछे आ रहा है। मानसी ने मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। फिर आगे बढ़ी तो फिर उसे महसूस हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है। पीछे मुड़कर देखा तो कोई नजर नहीं आया। मानसी को लगा कि यह उसका वहम है।

दो कदम और बढ़ी ही थी कि किसी ने पीछे से उसे पकड़ कर उसका मुंह बंद कर दिया। मानसी की नाक भी बंद हो गई थी। सांसें उसकी फूलने लगी थीं। मानसी को लगा कि अब तो जान ही निकल जाएगी। खुद पर उसका नियंत्रण खत्म हो गया। हाथों से बैग छूट कर नीचे गिर पड़ा। मोबाइल भी हाथ से छूट गया। बैग और मोबाइल जैसे ही हाथ से छूटे, उस आदमी ने मानसी को छोड़ दिया। बैग और मोबाइल लेकर वह वहां से भाग निकला।

मानसी को थोड़ा समय लग गया सामान्य होने में। रात होने की वजह से गली में कोई भी नहीं था। मानसी को यह भी होश नहीं था कि उसके चप्पल छूट गए हैं। नंगे पांव ही वह अपने घर पहुंची। वहां उसने सारी बात बताई। घरवालों की चिंता अब कहीं ज्यादा बढ़ चुकी थी। पापा और भाई ने तो साफ कर दिया कि अब ऑफिस नहीं जाना है। किसी तरीके से मानसी से की रात गुजरी।

अगले दिन मानसी ने फिर से घरवालों को मनाना शुरू किया। घरवाले मानने को तैयार नहीं थे। मानसी ने इस बार जिद दिखाई। आखिरकार उसकी जिद के आगे घरवालों को झुकना ही पड़ा।

अंदर से डर तो मानसी भी गई थी, फिर भी उसका उत्साह ठंडा नहीं पड़ा था। अपने पैरों पर मानसी खड़े रहना चाहती थी। अगले कुछ दिनों तक मानसी को डर जरूर लगा। फिर भी वह अपना काम करती रही।

कहते हैं कि जब कामयाबी आपके चरण चूमती है तो बहुत से लोग आपको देखकर ईर्ष्या भी करने लगते हैं। मानसी के साथ भी ऐसा ही हो रहा था। मानसी अच्छी-अच्छी खबरें लिख रही थी। उसकी खबरों का असर हो रहा था। मानसी का नाम धीरे-धीरे मीडिया में बढ़ता ही जा रहा था। इसकी वजह से उसके साथ काम करने वाले को उससे जबरदस्त ईर्ष्या होने लगी थी। उसके खिलाफ ऑफिस में लोगों ने चालें चलने शुरू कर दी।

मानसी के खिलाफ संपादक को भड़काया जाने लगा। मानसी की तरह-तरह की शिकायतें पहुंचाई जाने लगीं। मानसी जहां खबरों के लिए जाती थी, वहां उसके सहयोगियों ने उन्हें भड़काने शुरू कर दिया। इस वजह से मानसी के सूत्र भड़क गए थे। अब उसे खबरें मिलने में दिक्कत हो रही थी। मानसी का प्रदर्शन धीरे-धीरे गिरने लगा था। संपादक से प्रायः मानसी को डांट भी लग रही थी।

मानसी बहुत परेशान हो गई थी। छुप-छुप कर वह आंसू भी बहा लेती थी। ऐसा नहीं था कि मानसी मेहनत कम कर रही थी। दिनभर वह धूप में यहां-वहां दौड़ती थी। कई बार तो भोजन करने का भी समय नहीं निकाल पाती थी। फिर भी मानसी अपने सहयोगियों के जाल में उलझ गई थी। नौबत यहां तक आ गई थी कि मानसी को अल्टीमेटम भी दे दिया गया था। अच्छी खबरें लाओ, नहीं तो नौकरी छोड़ दो।

मानसी ने सोचा कि दूसरे अखबार में चली जाऊं। फिर उसने सोचा कि परिस्थिति से डर कर भागना कहीं से भी उचित नहीं। उसने ठान लिया कि वह इसी अखबार में रहेगी। मुकाबला करेगी। अपने काम से हर किसी को जवाब देगी।

मानसी ने अपनी मेहनत और बढ़ा दी। वह सतर्क भी रहने लगी। उसने अपने सूत्रों के बीच अपना भरोसा बढ़ाया। अलग-अलग विभागों के अधिकारियों से अच्छा संपर्क बनाया। धीरे-धीरे एक बार फिर से मानसी का काम बोलने लगा। सहकर्मियों के मुंह अब धीरे-धीरे बंद हो रहे थे। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि अब और क्या करें।

इसी दौरान एक प्रतिष्ठित मीडिया अवॉर्ड्स की घोषणा हो गई। इसके लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की गईं। सभी पत्रकारों ने अपने अच्छे-अच्छे आर्टिकल निकालने शुरू कर दिए। सभी ने आवेदन करना शुरू कर दिया। मानसी ने भी अपना एक सबसे अच्छा आर्टिकल चुना। उन्होंने भी इसके लिए आवेदन कर दिया।

परिणाम की घोषणा हुई तो मानसी का ही नाम आया। मानसी को यह मीडिया अवार्ड दिए जाने की घोषणा हो गई थी। जिस अखबार के लिए वह लिखा करती थी, उसी अखबार के पहले पन्ने पर उसकी फोटो के साथ ही खबर भी छपी थी। हर ओर से उसे बधाइयां मिल रही थीं।

अब वक्त आ गया अवॉर्ड सेरिमनी का। मानसी अपने मम्मी-पापा कर भाई-बहन के साथ तैयार होकर यहां पहुंची थी। उसके मां-बाप के चेहरे पर गर्व झलक रहा था। फिर मानसी के नाम की घोषणा हुई। मानसी अवार्ड लेने के लिए मंच पर पहुंच गई। आज मानसी की खुशी का ठिकाना नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए मानसी ने बड़ा संघर्ष किया था। आज उसे महसूस हो रहा था कि उसके संघर्ष की जीत हुई है।

मानसी अवार्ड हाथ में लेने ही वाली थी कि अचानक से उसे रुकने का इशारा किया गया। अवार्ड देने वाले के पास कुछ लोग पहुंचे। उनके कान में उन्होंने कुछ कहा। फिर वे लोग पीछे हट गए। मानसी को स्टेज से उतर जाने का इशारा किया गया।

इसके बाद फिर एक घोषणा हुई। इस घोषणा ने जो कहा गया उसे सुनकर मानसी के पैरों तले जमीन ही खिसक गई। इसमें कहा गया कि मानसी ने किसी और का आर्टिकल चुराया था। इसलिए वह इस अवार्ड की हकदार नहीं है। मानसी की जगह उसके एक सहकर्मी का नाम बुलाया गया उसे यह पुरस्कार देने की घोषणा की गई।

मानसी खुद को बड़ी अपमानित महसूस कर रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ है। काटो तो खून नहीं, ऐसी उसकी हालत थी। शर्मिंदगी से उसका चेहरा झुक गया था। समझ नहीं पा रही थी वह कि ऐसा कैसे हुआ। आर्टिकल तो उसका ही था।

ऑफिस जब पहुंची तो यहां हर कोई उसे देख कर हंस रहा था। फिर संपादक ने उसे अपने केबिन में बुलाया। संपादक ने भी डांट लगाई। उससे कहा कि अब से तुम्हें नौकरी पर आने की जरूरत नहीं है। मानसी आंसू बहाते हुए वहां से निकल गई। वह पूरी तरीके से टूट चुकी थी। घर पहुंच कर वह बहुत रोई। कई दिनों तक वह घर पर ही रही। आखिरकार उसने सच का पता लगाने का निर्णय लिया। वह न्याय खुद को दिलाना चाहती थी।

उसने इसकी पड़ताल शुरू कर दी। कई दिनों तक उसने मेहनत की। आखिरकार मानसी को अपने ईमेल का ध्यान आया। मानसी ने वह ईमेल खंगाला, जिसमें कि उसने वह आर्टिकल अपने ही एक और ईमेल आईडी पर भेजा था। उसने इसकी तारीख निकाल ली। मानसी संपादक से मिलने के लिए पहुंची।

उसने संपादक से कहा कि सर मुझे एक मौका दीजिए खुद की बेगुनाही साबित करने का। संपादक ने आखिरकार उसका अनुरोध स्वीकार कर लिया। मानसी ने संपादक से कहा कि आप अवार्ड लेने वाले से यह पूछिए कि उसने यह आर्टिकल कब लिखा था।

मानसी के उस सहकर्मी को बुलाया गया। उससे तारीख पूछी गई। उसने 15 अप्रैल, 2020 की तारीख बताई। इसके बाद मानसी ने अपना ईमेल संपादक को दिखाया। यह ईमेल उसने 20 फरवरी को ही भेजा था। इससे यह साफ हो गया कि मानसी ने यह आर्टिकल लिखा था। संपादक को भी इसके बाद अपनी गलती का एहसास हो गया।

मानसी के सहकर्मी से जब कड़ाई से पूछा गया तो उसने सच उगल दिया। उसने बताया कि उसे मानसी की सफलता से जलन हो रही थी। इसलिए उसने उसे नीचा दिखाने के लिए ऐसा किया। इसके बाद यह बात अवार्ड समारोह के आयोजकों तक पहुंचाई गई। वे भी अपनी इस गलती पर बेहद शर्मिंदा हुए।

उन्होंने एक बार फिर से मीडिया अवार्ड की घोषणा की। इसमें उन्होंने अपनी गलती के लिए न केवल सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी, बल्कि मानसी को सम्मानपूर्वक यह अवार्ड प्रदान किया।

मानसी की इस कामयाबी को देख उसके मां-बाप और उसके भाई-बहनों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। मानसी के पिता ने उससे कहा कि बेटी तुमने यह साबित कर दिया कि ईमानदारी से किसी काम में लगा जाए तो वह काम जरूर पूरा होता है। ईमानदारी से मेहनत की जाए तो कामयाबी जरूर मिलती है। खुद के प्रति ईमानदार रहो तो भगवान भी साथ देते हैं।

मानसी अब एक मशहूर पत्रकार के रूप में स्थापित हो गई है। अब तक उसने कई अवार्ड जीत लिए हैं। मां के दिल का ऑपरेशन भी उसने करवा दिया है। मां अब पूरी तरह से स्वस्थ हैं। मानसी हर किसी की प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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लेखक: शैलेश कुमार


धुंधली नजरें और आईएएस बनने का वो सपना

यह सुबह भी कुछ अलग नहीं थी। सूरज आज भी वैसे ही उगा था। पक्षी चहचहा रहे थे। लोग अपनी दिनचर्या में लग गए थे, लेकिन अखिल के लिए यह सुबह कुछ खास थी। एक ऐसी सुबह, जिसका उसे हमेशा से इंतजार था। आज इनकम टैक्स कमिश्नर के तौर पर उसे ड्यूटी ज्वाइन करनी थी।

रात भर ठीक से नींद नहीं आई थी। इंतजार था तो बस उस पल का जब वह अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ले। सुबह होते ही आंखों में एक बार फिर से पुरानी यादें तैर गईं। संघर्ष के वे दिन याद आ गए।

आईएएस बनने का सपना बचपन से ही संजोया था। बचपन से ही पढ़ाई में अखिल बहुत तेज था। न केवल शिक्षक उसे पसंद करते थे, बल्कि आस-पड़ोस में भी लोग उसकी कद्र करते थे। स्कूल की पढ़ाई आगे बढ़ती गई। कक्षा में अखिल टॉप करता रहा। आखिरकार, दसवीं का रिजल्ट भी आ गया और इसमें भी अखिल को 92 फ़ीसदी नंबर मिले थे। यह सिलसिला आगे भी चलता रहा।

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इंटर भी अच्छे नंबरों से उसने पास कर लिया और फिर ग्रेजुएशन में भी एडमिशन ले लिया। ग्रेजुएशन जब अखिल का पूरा हो गया तो अब वक्त आ गया था यूपीएससी की परीक्षा देने का। इसके लिए जी-जान से अखिल तैयारी में जुट गया। रात में देर तक जग कर अखिल पढ़ाई करता था।

फिर एक दिन सुबह उसकी नींद खुली तो उसे अपनी आंखों में खुजली महसूस हुई। उसने इसे नजरअंदाज किया। आंखों में पानी डाला और अपनी पढ़ाई उसने जारी रखी। खुजली उस वक्त ठीक हो गई थी, लेकिन शाम होते-होते यह और बढ़ गई।

फिर अखिल ने देखा कि बाईं आंख के अंदर एक घाव हो गया है। अखिल मेडिकल की दुकान पर गया। वहां से उसने एक मरहम खरीदा। उसे उसने मलना शुरू कर दिया। मरहम लगाने के बाद भी घाव ठीक नहीं हुआ। स्थिति ऐसी हो गई कि अब आंखों में दर्द होने लगा। अखिल की पढ़ाई इससे बाधित हो रही थी।

अखिल के पिता ने डॉक्टर से उसे दिखाया। डॉक्टर ने दवाई शुरू की, लेकिन यह घाव और बढ़ता चला गया। डॉक्टर ने आखिरकार हाथ खड़े कर दिए और अखिल को चेन्नई ले जाने की सलाह डॉक्टर ने उसके पिता को दी। पिता की आर्थिक स्थिति इतनी भी अच्छी नहीं थी कि महंगे अस्पताल में उसका इलाज करवा सकें। फिर भी पिता ने किसी तरीके से पैसे जुटाए। अखिल को लेकर चेन्नई पहुंचे।

चेन्नई में अखिल की आंख का ऑपरेशन किया गया। घाव ठीक हो गया, लेकिन आंख की पुतली पर एक दाग पड़ गया। ऐसे में सामने से उसे हर चीज धुंधली दिखने लगी। साइड से ही कोई चीज साफ दिख पाती थी। अखिल बेहद निराश हो गया। किसी तरीके से खुद को संभाला। सोचा कि चलो एक आंख तो ठीक है। उसी से पढ़ाई करके तैयारी हो जाएगी। आईएएस बनने का सपना पूरा हो जाएगा।

अखिल को नहीं मालूम था कि नियति उसका और इम्तिहान लेने वाली है। मुश्किल से एक महीना ही बीता था कि अखिल की दाईं आंख में भी वैसी ही समस्या हो गई। एक बार फिर से ऑपरेशन कराने की नौबत आई। इस बार भी वही हुआ। ऑपरेशन तो हो गया, लेकिन आंख की पुतली पर दाग रह गया। अब दोनों आंखों से अखिल को सामने की चीजें धुंधली दिखती थीं।

पढ़ाई करना अखिल के लिए अब मुश्किल हो गया। निराशा के गर्त में अखिल डूबता जा रहा था। पिता की भी आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि बहुत ज्यादा पढ़ाई और इलाज पर खर्च कर सकें। अखिल की कोचिंग बंद हो गई थी। फिर अखिल को स्वामी विवेकानंद की एक बात याद आई। उन्होंने कहा था कि उठो जागो और अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना रुको नहीं।

अखिल ने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए आईएएस तो बनना ही है। घर चलाने के लिए अखिल अपने पिता का साथ देने के लिए मजबूर था। उनकी दुकान में भी वह बैठता था। फिर भी उसने पढ़ाई के लिए रास्ता बनाना शुरू कर दिया। उसने ऑडियो बुक्स और ऑडियो नोट्स ढूंढने शुरू कर दिए। कई दोस्तों की मदद से धीरे-धीरे अखिल के पास ऑडियो पाठ्य सामग्री जमा होने लगी।

अखिल को दोस्तों से मदद मिली, क्योंकि वह भी उनकी बड़ी मदद करता था। समाज सेवा के काम में भी अखिल हमेशा आगे रहता था। न केवल जरूरत पड़ने पर वह मरीजों को खून अपने संपर्क से उपलब्ध करवाता था, बल्कि लोगों से पैसे जमा करके गरीबों को जरूरत की चीजें भी मुहैया कराने के काम में वह आगे रहता था।

दुकान में जब अखिल बैठता था तो कान में ईयरफोन लगाकर वह अपने फोन में मौजूद ऑडियो सामग्री को सुनता रहता था। उठते-बैठते, सोते-जागते अखिल ने इन्हें सुनना जारी रखा। धीरे-धीरे अखिल की तैयारी पुख्ता होती चली गई। पहली बार उसने यूपीएससी की परीक्षा दी। स्क्राइब की मदद से अखिल ने यह परीक्षा दी। परिणाम आया तो इसमें उसका नाम नहीं था। अखिल को निराशा जरूर हुई, लेकिन अगले साल उसने फिर से परीक्षा दी।

अखिल का पीटी क्लियर हो गया। अब मेंस की बारी थी। अखिल ने कमर कस ली थी। मेंस की परीक्षा का जब रिजल्ट आया तो इस बार अखिल का भी नाम इस सूची में था। इंटरव्यू के लिए अखिल का चयन हो गया था। अभी भी मंजिल बहुत दूर थी। अखिल ने जी-जान से इंटरव्यू की तैयारी शुरू कर दी। इंटरव्यू में वह शामिल भी हुआ। आखिरकार रिजल्ट आ गया। अफसोस कि इस बार भी अखिल का चयन नहीं हुआ।

लोगों ने अफसोस जताना शुरू कर दिया। उससे लोग सहानुभूति जताने लगे। अखिल को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। अखिल ने ठान लिया था कि निराश होने से कुछ हासिल नहीं होने वाला तैयारी जारी रखनी है।

अब हर बार अखिल एग्जाम देता था। हर बार इंटरव्यू भी देता था, लेकिन हर बार उसका चयन नहीं होता था। अखिल के लिए यह अंतिम मौका था। अखिल ने एग्जाम दिया। फिर से इंटरव्यू देने का उसे मौका मिला। लौटकर आया तो अखिल के दिमाग में बस एक ही बात थी। वह यही सोच रहा था कि मैंने अपना 100 प्रतीशत दिया है। चयन नहीं भी हुआ तो जिंदगी नहीं रुकने वाली। कुछ अच्छा ही करूंगा।

फिर आया रिजल्ट का दिन। इससे पहले कि अखिल रिजल्ट देख पाता, उसके मोबाइल पर एक फोन आया। उधर से आवाज आई, अखिल तुम्हारा 42 वां रैंक है। अखिल को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसके मुंह से निकला, क्या सच में? उधर से आवाज आई, यकीन न हो तो वेबसाइट पर देख लो।

इसके बाद तो उसके पास बधाई देने वालों का तांता लग गया। मीडिया वाले भी इंटरव्यू के लिए पहुंचने लगे। अंतिम प्रयास में अखिल को कामयाबी मिल गई थी। आईएएस बनने का सपना अब अखिल का पूरा हो रहा था। हार न मानने की जो अखिल ने ठानी थी, आखिर उसी ने उसकी सफलता के दरवाजे खोल दिए थे।

फिर अचानक मां की आवाज आई, अखिल ज्वाइन करने नहीं जाना है क्या? यह सुनकर अखिल पुरानी यादों के झरोखे से बाहर निकल आया। मां को जवाब दिया, बस मां तैयार होने ही जा रहा हूं। अखिल तैयार होकर निकलने लगा। मां ने उसे टीका लगाया। अखिल ने मां-पिताजी के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। फिर निकल पड़ा अखिल आज अपनी मंजिल से गले मिलने के लिए।

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लेखक: शैलेश कुमार