HINDI KAVITA: काले मेघ अब बरस जाओ

Hindi Poem on Rain
HINDI KAVITA | HINDI POEM | Kaale Megha Paani toh Barasao

काले मेघ अब बरस जाओ

आसमान में लुका छिपी का
खेल अब और न करो,
हमारी उम्मीदों पर
अब आरी न और चलाओ।

हे काले मेघ तरस खाओ
बस एक बार जमकर बरस जाओ,
धरा की प्यास बुझाओ
किसानों के बुझते चेहरों पर
अब तो मुस्कान लाओ।

प्रकृति की मुरझाती हरियाली को
संजीवनी तो दे जाओ।
सूखे हैं ताल पोखर
सूख रहे हैं नदियां नाले,
झूम के बरसो काले मेघा
उनके दामन को भी भर जाओ,
अब और न तरसाओ
काले मेघ बरस भी जाओ।

गर्मी से व्याकुल हम सब है,
बच्चे भी बिलबिला रहे हैं
पेड़ पौधे सूख रहे हैं,
पशु पक्षी भी व्याकुल हैं,
किसानों में भी बेचैनी है
देखो! विनती सभी कर रहे,
काले मेघ अब बरस भी जाओ।

लुकाछिपी अब बंद करो
इतनी सौगात अब दे ही जाओ,
हर ओर खुशियां बिखराओ
काले मेघ अब बरस भी जाओ।

केवल धरती की बात नहीं है
चारों ओर खुशहाली फैलाओ,
हर जीवन में शीतलता लाओ,
काले मेघ अब बरस भी जाओ।

अवसान होना चाहिए

परिवर्तन सृष्टि का नियम है
यह सबको आभास होना चाहिए,
कुछ भी हो,कैसे भी हो मगर
गलत परंपराओं का
अवसान होना चाहिए।

स्तर और स्वरूप कैसा भी हो
भले ही वह किसी व्यक्ति,
समाज, क्षेत्र या राष्ट्र का मसला हो,
जो गलत है हर स्तर पर उसका
खुला विरोध होना चाहिए,
हर एक को अपने स्तर से
उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए।

जो गलत है वह ही है
सही नहीं कहा जा सकता,
पद, प्रतिष्ठा, अहम या दहशत से
गलत कभी सही नहीं हो सकता।
जो भी गलत परंपराएं हैं
कभी टिक नहीं सकती,

विरोध की दीवार
जो बन जायें यदि हम सब
बहुत देर तक ये कभी
ठहर नहीं सकती।
बस। हमें फैसला लेना ही पड़ेगा
गलत को सरेआम गलत
तो कहना ही पड़ेगा।

मुँह छुपाकर ये तो गलत है
कहने भर से कुछ नहीं होगा,
हौसला और एकजुटता से ही
हर गलत परंपरा का अवसान होगा।

सिर्फ़ होना चाहिए का बस
बेसुरा राग गाने की बजाय,
हर एक को खुद आगे आना होगा
लक्ष्य पाने तक नहीं रुकना होगा
तब कहीं जाकर ही
गलत परंपराओं अवसान होगा।

व्यंग्य: जनसंख्या में भागीदारी

बड़ा दुःख होता है
कि आज चहुंओर जनसंख्या का
रोना रोया जाता है,
जैसे हमें कुछ समझ ही नहीं आता है।

सबको पता है जब
ईश्वर की मर्जी के बिना
एक पत्ता तक नहीं खड़क सकता,
तब भला ये कैसे मुमकिन है कि
ईश्वर की इच्छा के बिना
जनसंख्या का ग्राफ बढ़ सकता।

छोड़िए भी अब ये सब
बेकार की चिंता भर है,
जनसंख्या हो या महामारी
बेरोजगारी हो या भूखमरी
अभावों की दास्तां हो या फिर
भविष्य में होने वाली लाचारी
अथवा आने वाले कल में
भूख मिटाने के लिए
मानव के मानवभक्षी होने का
दिख रहा साफ संकेत।

कुछ भी कसूर हमारा तो नहीं
सब ऊपर वाले की इच्छा है,
ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जाने की
न तनिक हमारी सदइच्छा है।
काहे को बेकार की माथापच्ची में
उलझकर अपना सुकून खोते हो,

मरना तो एक दिन सबको है
फिर इतना बेचैन क्यों होते हो?
जनसंख्या घटे या बढ़े मेरी बला से
बेरोजगारी, भूखमरी, महामारी या
पड़े अकाल आप क्यों व्याकुल हो,
आखिर ईश्वर की ही
जब सब मर्जी चलती है,

तो फिर सब उसकी जिम्मेदारी है,
हमारी तो बस इतनी सी
मात्र यही लाचारी है,
ईश्वर के काम में हमारी आपकी
बिना किसी दुविधा रोकटोक
या ईश्वर पर बिना ऊँगली उठाये
हम सबकी शानदार भागीदारी है।

क्योंकि हम ऐसे ही हैं
अपने पर दोष भला कब लेते हैं,
अपने कृत्यों का दोष
कभी इस पर कभी उस पर
और तो और ईश्वर को भी

समय पर मोहरा बना ही लेते हैं
बड़ी शान से अपने कृत्यों का
दोष उन पर भी मढ़ ही देते हैं,
बस अपना पल्ला झाड़कर
सदा ही निश्चिंत रहते हैं।

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Author:

Sudhir Shrivastava

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.