पी.टी. उषा की जीवनी

Last updated on: April 21st, 2021

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Who is PT Usha | Biography | Jivani | Jivan Parichay | Full Name | Husband | Life History | Information in Hindi

पी.टी. उषा की जीवनी | P. T. Usha Biography in Hindi

पी.टी उषा उस महान खिलाड़ी का नाम है जिन्होंने पूरी दुनियाभर में भारत को गौरवान्वित किया है। पीटी उषा महिलाओं के लिए भी एक मिसाल हैं क्योंकि उन्होंने सभी बंदिशों तथा रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए एक एथलीट के रूप में अपनी पहचान बनाई। वे सभी खिलाड़ियों के लिए ही एक प्रेरणा का स्रोत ही नहीं बल्कि विश्वभर की समस्त महिलाओं के लिए एक आदर्श भी हैं।

पीटी उषा की मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि आज उन्होंने अपने जीवन में यह मुकाम हासिल किया है। आइए जानते हैं उनके संघर्षपूर्ण जीवन के बारे में-

नामपिलावुलकंडी थेक्केपारंबिल उषा
अन्य नामद पय्योलीएक्सप्रेस, गोल्डनगर्ल
पेशाट्रैक और फील्ड एथलीट
जन्म तिथि27 जून 1964
आयु(2021)56 वर्ष
जन्म स्थानपय्योली, कोझीकोड, केरल
राष्ट्रीयताभारतीय
वैवाहिक स्थितिविवाहित
पति का नामवी. श्रीनिवासन
बच्चेउज्ज्वल
धर्महिंदू
कोचओ. एम. नाम्बियार
ऊंचाई5’7”
वजन57 किलो
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पीटी उषा का प्रारंभिक जीवन (Early Life of PT Usha)

पिलावुलकंडी थेक्केपारंबिल उषा जिन्हें पीटी उषा के नाम से जाना जाता है, का जन्म 27 जून 1964 में हुआ। वह केरल के पय्योली गांव में पैदा हुईं। यही वजह है कि उन्हें पय्योली एक्सप्रेस के नाम से भी पहचान मिली। उनके माता-पिता का नाम ई.पी.एम पैतल और टीवी लक्ष्मी है। उनके पिता एक कपड़े के व्यापारी हैं। पी टी उषा की दो बहने तथा एक भाई हैं।

बचपन से ही पीटी उषा को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हालांकि जब उन्होंने स्पोर्ट्स एक्टिविटीज में हिस्सा लेना शुरू किया तब उनके स्वास्थ्य में परिवर्तन आना शुरू हुआ। वे जब कक्षा चौथी की छात्रा थीं तभी से उन्हें दौड़ना पसंद था। एक बार जब वह सातवीं कक्षा की छात्रा थीं उस दौरान उनके शारीरिक शिक्षा के अध्यापक ने उन्हें स्कूल की चैंपियन के साथ रेस लगाने को कहा। लेकिन देखते ही देखते पी.टी उषा ने उस चैंपियन को हरा दिया। अध्यापक समेत पूरा स्कूल हैरान रह गया।

जिसके बाद से लगातार वे अपने स्कूल के जिला स्तर पर होने वाले सभी मुकाबले में विजयी होती रही। उनका कहना है कि उनके चाचा जी स्कूल अध्यापक थे इस वजह से उन्हें अपने परिजनों को एक एथलीट के रूप में करियर बनाने के लिए मनाने में ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा। उनके माता-पिता ने न सिर्फ उनके एथिलीट कैरियर को आगे बढ़ाया बल्कि उनकी ट्रेनिंग में भी मदद की।

पी.टी उषा जब सुबह ट्रेनिंग के लिए निकलती थी तब उस दौरान रास्ते में बहुत से कुत्ते हुआ करते थे। इससे अपने बेटी की रक्षा के लिए उनके पिता एक छड़ी लेकर मैदान में जाया करते थे। उन्होंने अपने जीवन में यह मुकाम हासिल करने के लिए कई मुश्किलों का सामना किया। उन्होंने धूल भरे रास्ते से लेकर गाड़ियों के बीच भी दौड़ की प्रैक्टिस की। हालांकि उनका कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा समुद्र किनारे दौड़ना पसंद है।

लेकिन अगर देखा जाए तो असल में उनके करियर की शुरुआत तब हुई जब वह सिर्फ 13 साल की थी। तभी 1976 में एक महिला खेल सेंटर की शुरुआत की गई थी। यह खेल सेंटर केरल सरकार ने कन्नूर में शुरू किया था। जिसमें 40 महिलाओं में से पी टी उषा का चयन किया गया था। उस दौरान उनके कोच श्री ओ. एम. नाम्बियार थे। पीटी उषा आज जो भी हैं उसका सबसे ज्यादा श्रेय अपने कोच नाम्बियार को देती हैं। इसके 2 साल बाद 1978 में उन्होंने केरल में अंतरराज्यीय मुकाबले में तीन स्वर्ण पदक हासिल किए।



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पीटी उषा का करियर (PT Usha’s Career)

उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत साल 1980 में हुई। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में मॉस्को के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में हिस्सा लिया और सिर्फ 4 साल के अंदर ही वे ओलंपिक के फाइनल में पहुंच गई। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला एथलीट भी बनी। 1980 में कराची में पाकिस्तान ओपन नेशनल मीट आयोजित किया गया था जिसमें पीटी उषा ने 4 गोल्ड मेडल जीते और भारत का सर गर्व से ऊंचा किया। साल 1982 में उन्होंने वर्ल्ड जूनियर इनविटेशन मीट में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने 200 मीटर की रेस में गोल्ड मेडल जीता जबकि 100 मीटर की रेस में उन्हें ब्रोंज मेडल मिला था। इसके अगले ही साल कुवैत में एशियन ट्रैक एंड फील्ड चैंपियनशिप आयोजित की गई जिसमें पी टी उषा ने 400 मीटर की रेस में रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। एक बार साल 1984 में पीटी उषा ने ओलंपिक की तैयारी करनी शुरू की उन्होंने फाइनल राउंड में 400 मीटर की दौड़ पूरी की। हालांकि फाइनल 1/100 मार्जिन से उन्हें हार मिली लेकिन फिर भी यह पहली बार था जब कोई भारतीय महिला एथलीट, ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थी। इस दौरान उन्होंने 400 मीटर बाधा दौड़ 55.42 सेकेंड में पूरी की जो भारत के लिए एक नेशनल रिकॉर्ड था।

1988 में साउथ कोरिया के सिओल में ओलंपिक गेम्स का आयोजन किया गया था उषा को उसमें हिस्सा लेना था लेकिन ठीक उससे पहले उनके पैर में चोट लगी। वे उसी हालत में ओलंपिक गेम्स में शामिल हुई लेकिन वे इसे जीत नहीं पाई।

उन्होंने 1989 में ‘एशियन ट्रैक फेडरेशन मीट’में हिस्सा लिया जो कि दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस दौरान उन्होंने 4 गोल्ड मेडल और 2 सिल्वर मेडल अपने नाम किए। उन्होंने 1990 में ‘बीजिंग एशियन गेम्स’ में हिस्सा लेते हुए 3 सिल्वर मेडल अपने नाम किए और इसके साथ ही उन्होंने एक कड़ा फैसला लेते हुए एथलेटिक्स से संन्यास लिया।



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पीटी उषा का निजी जीवन (Personal Life of PT Usha, Marriage & Husband)

जैसे कि पहले ही बताया गया है पी.टी उषा ने 1990 में बीजिंग एशियन गेम्स के बाद ही एथलेटिक्स से संन्यास ले लिया था। 1991 में वे शादी के बंधन में बंधी और वी. श्रीनिवासन से उन्होंने शादी की। इसके बाद उनके बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम उज्जवल है।

लेकिन शादी के बाद उनका करियर वहीं नहीं रुका। पीटी उषा बताती हैं कि उनके करियर के लिए उनके पति ने समर्थन किया क्योंकि उनके पति खुद भी एक कबड्डी के खिलाड़ी हैं तथा उन्होंने पीटी उषा की हौसला अफजाई की। जिसके बाद उन्होंने 34 साल की उम्र में 1998 में एथलेटिक्स में वापसी की, उन्होंने ‘एशियन ट्रेड फेडरेशन मीट’ में हिस्सा लिया जो कि जापान के फुकुओका में आयोजित किया गया था। इसमें उन्होंने 200 तथा 400 मीटर की रेस में ब्रोंज मेडल अपने नाम किया। साल 2000 में आखिरकार उन्होंने एथलेटिक्स से संन्यास लिया।



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पीटी उषा के अवार्ड्स और उपलब्धियां (PT Usha Awards and Honours)

  • पीटी उषा ने 1980 में मास्को ओलंपिक में हिस्सा लिया था उस दौरान वे 16 साल की थीं जिस वजह से वह सबसे कम उम्र की भारतीय एथलीट बनी।
  • उन्हें 1981 में पुणे इंटरनेशनल इनविटेशन मीट में दो स्वर्ण पदक हासिल हुए।
  • 1983 में उन्हें विश्व कनिष्ठ प्रतियोगिता जो सियोल में आयोजित किया गया था, में एक स्वर्ण पदक तथा एक रजत पदक हासिल हुआ।
  • पीटी उषा पहली ऐसी महिला एथलीट है जिन्होंने ओलंपिक के फाइनल में अपनी जगह बनाई थी।
  • पीटी उषा को साल 1984 में अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया।
  • उन्हें साल 1985 पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
  • उन्हें इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के द्वारा ‘स्पोर्ट्स पर्सन ऑफ द सेंचुरी’ और ‘स्पोर्ट्सविमेनवीमेन ऑफ दीमिलेनियम’ के खिताब से नवाजा गया।
  • 1985 में ‘एशियन एथलीट मीट’ जकार्ता में आयोजित किया गया इसमें पीटी उषा को ‘ग्रेटेस्ट विमेन एथलीट’ के खिताब से नवाजा गया।
  • उन्हें 1985 एवं 1986 में ‘World Trophy for Best Athlete’ से नवाजा गया।
  • उन्हें 1986 में ‘एडिडास गोल्डन शू अवॉर्ड फॉर दी बेस्ट एथलीट’ के खिताब से सम्मानित किया गया।
  • मौजूदा समय में पीटी उषा केरल में एक एथलीट स्कूल चलाती है जिसमें वह वहां नौजवान एथिलीट को ट्रेनिंग दिया करती हैं।
  • उन्हें 1999 में केरल खेल पत्रकार इनाम से नवाजा गया।
  • पीटी उषा ने 1984 लॉस एंजिलिस ओलंपिक में 400 मीटर प्रतिस्पर्धा बाधा दौड़ सिर्फ 55.42 सेकंड में पूरा किया जो कि आज एक नेशनल रिकॉर्ड है।
  • पीटी उषा ने अपने 2 दशक के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय करियर में कुल 102 मेडल जीते हैं।



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पीटी उषा की आत्मकथा (Autobiography of PT Usha)

पीटी उषा के जीवन की आत्मकथा का नाम गोल्डन गर्ल है यह 1987 में लिखी गई थी।

भले ही आज पीटी उषा अपने एथिलीट करियर से संयास ले चुकी है लेकिन अब भी वह देश को गौरवान्वित कर रही हैं। दरअसल, मौजूदा समय में वे अपनी स्पोर्ट्स एकेडमी के जरिए यंग एथलीट को ट्रेनिंग दे रही हैं। उनके साथ इस कार्य में टिंटू लुका भी शामिल है जिन्होंने साल 2012 में लंदन ओलंपिक विमेन सेमीफाइनल में 800 मीटर की रेस क्वालीफाई की थी।

तो ऊपर दिए गए लेख में आपने पढ़ा पी.टी. उषा की जीवनी | P. T. Usha Biography in Hindi, उम्मीद है आपको हमारा लेख पसंद आया होगा।

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Author:

भारती, मैं पत्रकारिता की छात्रा हूँ, मुझे लिखना पसंद है क्योंकि शब्दों के ज़रिए मैं खुदको बयां कर सकती हूं।