HINDI KAVITA: जीवन के रंग

जीवन के रंग

जीवन की दुनियां
बहुरंगी है।

जीवन में सुख दुख के बादल है
सुंदर आशा और
घोर निराशा भी है
अपने पराये दोस्त दुश्मन
इस जीवन के साये में हैं।

जीवन ने
अमीरी गरीबी, जाति धर्म
निंदा नफरत,
प्यार, इकरार, तकरार
मिलन,विच्छेद के
रुप भी दिखाये हैं।

सद्भाव, सांप्रदायिकता,
एकता, भाईचारा
हिंसा, अनाचार, अत्याचार
भ्रष्टाचार, शिष्टाचार
षडयंत्र, आडंबर, स्वर्ग नरक के रुप भी
इसी जीवन ने दिखाए हैं।

इस जीवन के अनोखे रंग ने
चाहे, अनचाहे रंग हमें
समय समय पर दिखाए हैं।

सादगी में खूबसूरती

ईश्वर ने हमें
बहुत सोच समझकर बनाया
सुंदर शक्ल शरीर दिया
जरूरत के हिसाब से
आँख कान मुँह नाक व
हाथ पैर सिर दिए
हमारे जीवन की जरुरत
पूरी करने के लिए
प्रकृति का खूबसूरत उपहार दिया।

परंतु अफसोस
आज हम प्रकृति से ही खिलवाड़
करने लगे हैं,
ईश्वरीय विधान में
व्यवधान बनने लगे हैं,
सादगी पर कृतिमता का
मुलम्मा चढ़ाने लगे हैं
प्रकृति की सुंदर सादगी पर
प्रहार करने लगे हैं।

ऐसा लगता है कि
हम सब भूल रहे हैं
सादगी में ही
कुदरती खूबसूरती है,
या फिर घमंड में हैं कि
आज तो हम ही ईश्वर हैं।

ठहरिए, सोचिए
कहीं हम खुद के लिए
धरती, पशु पक्षी,जीवों
मानवों के दुश्मन
तो नहीं हो रहे हैं?

सरस

जीवन के विविध रुप
कभी रंग,कभी बदरंग
निराश मत होइये
खुद को निराशा के दलदल से
बाहर निकालिए,

जीवन की कालिमा को मिटाइए।
जीवन की बगिया को
सरस रंग से रंगीन बनाइये
खुद खुश रहिए
दुनियाँ को खुशहाल बनाइये।

बचपन जिंदा है

आज भी बचपन
जिंदा हो जाता है
जब फुर्सत के क्षणों में मिलता है
नन्हें मुन्ने बच्चों का साथ
उनके साथ खेलना, पतंग उड़ाना
झूठमूठ का रूठना मनाना।

याद आ ही जाता है
बचपन का वो अपना जमाना।
न कोई फिक्र, न ही चिंता
न कोई भेद,न नफरत,
न जाति धर्म का कोई खटपट,
न अपने पराये का चकचक
बस मस्त,अलमस्त
बच्चों को देखता हूँ

लड़ते झगड़ते फिर अगले फल
उसी तरह का मेल मिलाप
हुड़दंग मचाता बाल समूह
जिंदा हो उठता बचपन
तैर जाती है आँखों में
जिंदा हो जाती हैं तस्वीरें
अपने बचपन की।

भाग्य रेखा

खुद में विश्वास की
नींव मजबूत कीजिए,
अपने पुरुषार्थ पर
यकीन कीजिये।
भाग्य तो सिर्फ़
मन बहलाने का
साधन मात्र है,
यकीन न हो तो
पुरुषार्थ करके देखिए।

भाग्य भी आपके
साथ सदा रहता कहाँ है?
बस यकीन कीजिए
आगे बढ़िए,
अपने पुरुषार्थ को
जागृति कीजिए।

यकीन मानिए
आपका भाग्य बदल जायेगा,
भाग्य भी भय से
आपके हाथों की
लकीरों में सिमटकर
आपकी भाग्य रेखा बन जायेगा ।

लज्जा

लज्जा मुझे नहीं आती
क्योंकि आधुनिकता ने
लज्जा से मुक्त कर दिया है।

मान सम्मान सभ्यता से दूर
मुझे न कोई चिंता, न फिक्र
माँ बाप का जीना मरना
दुःख सहना उनका कर्म है,
आवारागर्दी करने,गुलछर्रे उड़ाना ही
मेरा धर्म है।

जब मेरे बाप को
अपने बाप पर तरस नहीं आया,
तो फिर लाज शर्म के चक्कर में
मैं अपनी बिगाड़ू क्यों काया?

लज्जा भी हमसे दूर रहती है
लज्जा हीन के पास आकर ही
क्या वो सूकून पाती है?
इसलिए भाषण बंद कीजिये
जिसे लज्जा आती हो,
जाकर उसकी खोज कीजिए।

मानवाधिकार दिवस

अच्छा है कि हम
बहुत से दिवस
विशेष तिथियों में मनाते हैं,
वैसे ही हम मानवाधिकार दीवस भी
हर साल दस दिसंबर को मनाते हैं।

परंतु दिवस की सार्थकता भी
साबित होनी चाहिए,
मानव कल्याण, अधिकार पर
बात ही नहीं
काम भी होना चाहिए।

मानव हितों के लिए
काम भी दिखने चाहिए,
दिवस मनाने का परिणाम भी
सामने आना चाहिए,
सिर्फ़ औपचारिकता के लिए
दिवस नहीं मनाना चाहिए।

जीवन के भाव

रेगिस्तान के वीरानियों में भी
सूर्योदय का प्रकाश
जब बिखरता है
तब ऐसा लगता है कि
वहाँ भी जीवन का बीज
अंकुरित होने को है।

ये हमारे लिए संदेश जैसा है
कि लाश निराशा और
वीरानियों के बीच भी
जीवन का भाव
अंकुरित हो ही जाता है।

अन्वी जन्मोत्सव

अन्वी तेरे जन्मदिवस पर
हर्षित गर्वित होता हूँ,
अपने मन में खुशियों के मैं
गुलदस्ता लिए झूमता हूँ।

मुझको तू है जान से प्यारी
तू मेरा अभिमान है
मेरे साँसों की डोर बनी तू
आन,बान और शान है।

हर दिन हर पल तू मुस्काए
ये ही चाहत मेरी है,
हिम शिखरों पर पहुंचे तू
ये ही कामना मेरी है।
तू मेरी पहचान बने
यही कामना है दिल में
सौ सौ साल जिये तू अन्वी
बस इतनी सी चाहत है।

मेरी बगिया की तू है कली
बनकर फूल महकती जा
मेरी यही कामना अन्वी
साल दर साल तू जीती जा।

जन्मदिवस की तूझको अन्वी
लाखों लाख बधाई हो,
यही कामना है बेटी
हर पल तू हर्षायी हो।

जिम्मेदारी

ये देश हमारा है
बस इसी गुमान में मत रहिए
देश से प्यार भी कीजिए,
आपकी भी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं
उसका भी निर्वाह कीजिए।

देश और देश के संसाधनों पर
आपका भी हक है
इसमें नया क्या है?
देश के प्रति आपकी भी
कुछ कर्तव्य भी
उसे भी तो कीजिये।

ये मत भूलिए
कि देश आपका है
आपसे नहीं है,
आप देश से हैं
देश आपसे नहीं है।

गुरुर भर मत कीजिए
कि देश हमारा है,
अपनी जिम्मेदारी निभाइए
देश को आगे बढ़ाइए
देश को सबसे आगे ले जाना है
एकता और विकास का
परचम लहराना है,

आइए !आप भी
कंधे से कंधा मिलाइए
हम सब अपनी अपनी
यथोचित जिम्मेदारी निभायें
तब कहें देश हमारा है
तो हमारी जिम्मेदारी भी है।

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Author:

सुधीर श्रीवास्तव
शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल
बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002